
गंगाराम के पनही पहिरे के सपना
गंगाराम ह स्काउट के डरेस पहिर के जब घर ले निकलिस त चारोंमुड़ा ल देख के पहिली पक्कालिस कि कोनो देखत तो नइए। अउ जब कोनो नइ दिखिस त वोकर देह अइसे अकड़ गे, जइसे कोनो दूबर-पातर मइ-नखे घलो पुलिस के डरेस ल पहिरथे त गजब अकड़ आ जाथे। बस, उही हाल गंगाराम के हे। स्काउट डरेस म लेफ्ट-राइट करत छाती तान के गली के चिखला माटी म रेंगत हे, छपाक-छपाक।
स्काउट डरेस म गंगाराम कोनो फौजी ले कम नजर नइ आत हे। बस, एकेच कमी रइ गे हे, ‘पनही’ के। जेकर घर म एक जुवार के बासी-भात के ठिकाना नइये, वोकर लइका के गोड़ म पनही कहां ल होय। छठमी कक्छा म भरती होइस त उहू अपन नांव लिखा लिस स्काउट म। ए सोच के कि डरेस के संग पनही घलो मिलही पहिरे बर। हालांकि ए कहना गलत होही कि गंगाराम सिरिफ पनही के लालच म स्काउट म नाव लिखाय रिहिस।
बिचारा गंगाराम! पिकनिक म जाय बर बिना पनही के ही निकले हे। पन्दरा-बीस कदम चलिस होही कि बाजू के घर ले आवाज आइस। कहां जात हस रे गंगाराम? गांव के गुरुजी वोला सेल्यूट करत पूछिस। गंगाराम लजा गे। गुरुजी ल दूरिहा ल ही पैलगी करत जवाब दिस। स्कूल कोती ले आज जंगल जात हन गुरुजी। अच्छा, पिकनिक जात हव। बढिय़ा बेटा, जियत राह।
गुरुजी असीस देत वोकर चिखला म सनाय गोड़ ल देख के पूछिस- फेर, पनही काबर नइ पहिरे हस रे? जंगल म तो किसिम- किसिम के कांटा-खूंटी होथे बेटा। सांप- बिछी अलग। मोला बने नइ लागे गुरुजी पनही पहिरे म। गंगाराम अपन बेबसी ल मुस्कान के चद्दर म ढांक के किहिस। गुरुजी कहिस-गंगाराम! मोर बेटा तोरेच उमर के हवे। फेर वोकर गोड़ म नावा पनही लाने हंव तेन ह चाबत हे। तोर गुरवाइन दाई कहत रिहिस कि गंगाराम बने हुसियार लइका आय। वो दिन मोर बड़ भारी काम करे रिहिस, पनही ल उही ल दे देहव। ले जा पहिर के जा गंगाराम।
गंगाराम गरीब जरूर हे, फेर आत्मसम्मान के भावना ए उमर म घलो कूट-कूट के भरे हे। भूखन मर जाही, फेर ककरो मेर मांग के खाना, चोरी-चकारी करना कभु नइ जानिस। एकदम सिधवा, गाय सही। फेर, ककरो मदद करे बर अघवा। गरीब के लइका अपन उमर ले पहिलीच सियान हो जाथे। वोकर मन म न तो नावा-नावा खाय के लोभ, न पहिरे- ओढ़े के सउंक। मन ल मारत-मारत न जाने कब बड़े हो जाथे। गंगाराम घलो इहीमन सही देह ले लइका अउ मन ले सियान रहय। बस वोकर एके साध रहय ‘पनही’ के।
पिकनिक के जगा म बस ह हबरिस त लइकामन के खुसी के ठिकाना नइ रहय। सब लइका जंगल म अपन-अपन संगीमन संग सब एती -वोती किंजर के देखत हें। सब लइका तो अपन संगीमन संग खेले-कूदे म मगन होगे, फेर गंगाराम खाना बनइयामन के मदद बर उही जगा रुक गे। फूंक-फूंक के आगी बारे ले लेके नून- तेल, मिरचा-मसाला सब्बो ल अमर-अमर के देवई, लकरी के बुझाय के पहिलीच चूल्हा म लकरी डरई, इही म मंगन रहय।
बड़े गुरुजी वो कर सेवा भाव ल देख के बड़ खुस होइन। अचानक जब गंगाराम के खाली गोड़ म नजर परिस त पूछिस-तोर पनही कहां हे गंगाराम? गंगाराम के फेर उही रटे-रटाए जवाब-मोला बने नइ लागे गुरुजी पनही पहिरे म।
बड़े गुरुजी अउ कुछु कहितिस, तभे खाना बनात चपरासी सोभाराम के चीख सुनई परिस। दार के देगची ल चूल्हा ले उतारत बिछल गिस अउ सोभाराम आगी म झपा गे रहय। कोनो बचाय बर आतिन एकर पहिलीच गंगाराम आव देखिस न ताव सिद्धा कूद गिस वोला बचाय बर। सोभाराम तो बाच गे फेर गंगाराम के डेरी गोड़ जर गे।कम से कम डेढ़-दू महीना लागही घाव के भरे म।
गांव के डाक्टर आथे इलाज बर। बड़े गुरुजी अपन पइसा ले वोकर इलाज-पानी करवात हें। खटिया म परे दस-बारा दिन होगे हे। आज चपरासी सोभाराम हाथ म एकठन डब्बा धरे इस्कूल के जम्मो गुरुजीमन संग गंगाराम ल देखे बर आय हें।
कइसे तबियत हे गंगाराम? बड़े गुरुजी पूछिन। इस्कूल म सब तोर सुरता करथें। अंगजेरी वाला गुरुजी वोकर जरे गोड़ ल देखत किहिन-देख तो गंगाराम! तोर बर सोभाराम का लाने हे। बिचारा लइका! सब्बोझन ल एक संग देखके हड़बड़ा गे रहय। सोभाराम वोकर तीर म आके डब्बा ल देत किहिस। गंगाराम लजात-लजात डब्बा ल खोलिस त भीतर एक जोड़ी नावा पनही ल देखके वोकर चेहरा पुन्नी के चंदा सही जगमगा गे। आंखी के कोर म जोगनीमन सही आंसू के बूंदी झिलमिलागे।
चपरासी सोभाराम अचानक गंगाराम के जेवनी गोड़ ल धर लिस अउ किहिस- वो दिन तैं मोर जिनगी ल बचाय रेहेस। नइ तो आज मोर हाड़ा-गोड़ा गंगा म बोहात रहिचिस। तैं ए पनही ल पहिर लेबे न त मोरोमन ल सांति मिसगी। अतका खुस गंगाराम कभु अपन जिनगीभर म नइ होय रिहिस। सोभाराम अउ गुरुजीमन ल का कहे, समझे नइ पइस।
गोड़ के ध्यान रखबे, कहिके सब अपन घर चल दिन। तहां ले गंगाराम फेर वो डब्बा ल उघार के देखिस। करिया रंग के नावा पनही। गंगाराम जेवनी गोड़ के एकठन पनही ल पहिर के खटिया म बइठे-बइठे ठक ले कचारिस। मजा आ गे। फेर, जेवनी गोड़ म खड़े होके फोजीमन कस ठक, ठक, ठांय...!
Published on:
13 Mar 2023 04:10 pm
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