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कैसे खेलेगा इंडिया...स्कूल-कॉलेजों में नहीं हैं पीटीआई, इधर डिग्रीधारी घूम रहे बेरोजगार

locationरायपुरPublished: Feb 07, 2024 08:47:05 am

Submitted by:

Khyati Parihar

Raipur News: देश में स्पोर्ट्स को बढ़ावा देने के लिए खेलो इंडिया शुरू किया गया है। इधर, प्रदेश में कई स्कूल-कॉलेज ऐसे हैं जहां पीटीआई ही नहीं हैं। स्कूलों की बात करें तो 2010 के बाद सीधे 2020 में सिर्फ एक बार भर्ती निकाली गई। वह भी मामूली से पदों के लिए।

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Chhattisgarh News: देश में स्पोर्ट्स को बढ़ावा देने के लिए खेलो इंडिया शुरू किया गया है। इधर, प्रदेश में कई स्कूल-कॉलेज ऐसे हैं जहां पीटीआई ही नहीं हैं। स्कूलों की बात करें तो 2010 के बाद सीधे 2020 में सिर्फ एक बार भर्ती निकाली गई। वह भी मामूली से पदों के लिए।
विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के मामले में 1994 के बाद से अब तक एक बार भी स्पोर्ट़्स टीचर की भर्ती नहीं की गई है। अहम सवाल ये है कि ऐसे में कैसे खेलेगा इंडिया? मौजूदा नियमों के मुताबिक केवल हायर सेकंडरी स्कूलों में ही पीटीआई रखे जाते हैं। प्रदेश में हायर सेकंडरी स्कूलों की संख्या 4300 से ज्यादा है। जबकि, पीटीआई 3 हजार के करीब ही हैं। यानी 1300 से ज्यादा पोस्ट अभी ही खाली पड़े हैं। वहीं, मिडिल और हाई स्कूलों में पीटीआई न होने से खेल की स्थिति बहुत बुरी है। यहां भी एक-एक एजुकेशन टीचर रखे जाएं तो स्थिति बेहतर हो सकती है। इधर, हर साल सैकड़ों युवा फिजिकल एजुकेशन (बीपीएड, एमपीएड) की पढ़ाई कर निकल रहे हैं। ये युवा बेराजगारी के दिन काटने को मजबूर हैं क्योंकि भर्तियां ही नहीं निकल रहीं।
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भर्ती नहीं हो रही तो पदों को खत्म किया जा रहा

स्कूलों की तरह कॉलेजों में भी स्पोर्ट्स टीचर बहुत जरूरी हैं। लेकिन, यहां इनकी संख्या न के बराबर है। मिली जानकारी के मुताबिक पीएससी ने आखिरी बार 1994 में स्पोर्ट्स टीचर की भर्ती की थी। इसके बाद से अब तक कॉलेजों में स्पोर्ट्स टीचर नहीं रखे गए। बताते हैं कि अब इन पदों को डेड घोषित किया जा रहा है। एमपीएड कर चुके छात्रों का कहना है कि निजी कॉलेजों में कम से कम एक स्पोटर्स टीचर ताे रखे ही जाते हैं। लेकिन, सरकारी कॉलेजों से इस पद को ही खत्म किया जा रहा है। ऐसे में उनके भविष्य पर संकट छा गया है।
खेल भले न हो पर बजट है और फीस भी ले रहे हैं

स्कूलों और कॉलेजों में भले ही खेल सुविधाएं न हों, स्पोर्ट्स टीचर न हों, लेकिन सभी स्कूलों और कॉलेजों में खेल का बजट निर्धारित किया गया है। इसके अलावा स्कूल-कॉलेज के शुल्क की पर्ची में खेल की फीस का भी उल्लेख रहता है। इसकी राशि भी निर्धारित होती है।
इधर, राज्य के विवि-कॉलेज से हर साल निकल रहे हजार युवा

प्रदेश में अभी अलग-अलग विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में फिजिकल एजुकेशन की 1200 सीटें हैं। हर साल एक हजार से ज्यादा इसकी पढ़ाई कर निकल रहे हैं। रायपुर के पं. रविशंकर विवि, विप्र कॉलेज, रावतपुरा कॉलेज, मैट्स कॉलेज, हरिशंकर कॉलेज, डिग्री गर्ल्स कॉलेज, दुर्ग, भिलाई, बिलासपुर, अभनपुर, धमतरी के विवि और कॉलेजों ये कोर्स संचालित हैं। समस्या ये है कि आज खेल को करियर के रूप में देखा तो जा रहा है। लेकिन, प्रदेश में इस कोर्स के कॅरिअर पर ही सवालिया निशान लग गए हैं।
अन्य राज्यों के बच्चों को मिल रहा फायदा, हमारे ही पीछे छूटे

बता दें कि अन्य राज्यों में फिजिकल एजुकेशन को एक विषय के रूप में मान्यता दी गई है। ऐसे में वहां पढ़ाई के बाद नौकरी मिलना तय है। यही वजह है कि हर साल बड़ी संख्या में अन्य राज्यों के बच्चे छत्तीसगढ़ के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में फिजिकल एजुकेशन की पढ़ाई करने के लिए आते हैं। वापस अपने राज्य जाकर नौकरी भी पा जाते हैं। इधर, स्थानीय युवा पढ़ाई पूरी करने के बाद बेरोजगार घूमने को मजबूर हैं।
स्कूलों में पीटीआई के पद खाली हैं। इनमें भर्ती का फैसला सरकार लेगी। शासन के दिशा-निर्देशों के मुताबिक ही कार्रवाई की जाएगी।- दिव्या उमेश मिश्रा, डीपीआई

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