
जो बदलाव इंजीनियर और डॉक्टर नहीं ला सकते वे चेंजेस एक टीचर ला सकता है
रायपुर। जब हर बच्चा अलग है तो उसे सिखाने का तरीका एक क्यों? वह भी अलग होना चाहिए। यही बात टीचर को समझनी है। जो बदलाव इंजीनियर या डॉक्टर नहीं ला सकता वह टीचर ला सकता है। यह कहना है स्कूल ऑफ स्पेशल एजुकेशन इग्नू नई दिल्ली के प्रो. डॉ अमिताभ मिश्रा का। न्यू सर्किट हाउस में आकांक्षा लायंस इंस्टीट्यूट ऑफ लर्निंग एंड एम्पॉवरमेंट की ओर से आयोजित इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में बतौर की-नोट स्पीकर शामिल हुए। उन्होंने कहा कि पैरेंट्स स्पेशल बच्चों को इन्क्लुजन स्कूल तक लाने में देरी कर देते हैं। हमारे यहां वे 11 साल की उम्र या इसके बाद लाते हैं। इस उम्र में उन्हें सिखाना किसी भी टीचर के लिए मुश्किल भरा काम होता है। कम उम्र में ही उसे लाया जाए तो उसे डायग्नोस्ट किया जा सकता है। जब हम आईटी और इकोनॉमी में पॉवरफूल हैं तो इन्क्लुजन में क्यों नहीं हो सकते? स्पेशल स्कूलों की वजह से इन्क्लूजन स्कूल बंद हो सकते हैं। मोबाइल फोन चलाने के लिए हमें कोई अलग कोर्स करना होता है क्या? अपने आप ही सीख जाते हैं। ऐसा ही नजरिया हमें स्पेशल बच्चों के लिए रखना होगा।
आस्ट्रेलिया में इन्क्लुसिव एजुकेशन ज्यादा
पिछले 8 वर्षों से आस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे राउरकेला डॉ राहुल गांगुली ने बताया कि भारत और आस्ट्रेलिया में डिसएबिलिटी का परसेंटेज सेम है। चूंकि वहां की आबादी 3 करोड़ से भी कम है। इसलिए वहां डिसएबल्ड के लिए कई सुविधाएं हैं। भारत में तो नॉर्मल लोगों के लिए ही नौकरियां नहीं हैं। मैंने भारत सरकार के मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस एंड एम्पॉवरमेंट के साथ 6 साल काम किया है। कुछ ऐसे कारण रहे कि मुझे यह छोडऩा पड़ा। ऑस्ट्रेलिया में नेशनल डिसएबिलिटी इंशोरेंश स्कीम पास किया गया है। इसमें जन्म से लेकर 64 साल तक 10 हजार से 1.20 लाख रुपए दिए जाते हैं। यह राशि इलाज के लिए मिलती है। जबकि भारत में महज 300 रुपए हैं, क्योंकि यहां पॉपुलेशन ज्यादा है। आस्ट्रेलिया में रिसोर्सेस ज्यादा हैं। स्पेशल स्कूल बहुत कम हैं। बिहेवियर प्रॉब्लम होने के कारण कुछ बड़े स्पेशल स्कूल खोलने पड़े हैं। बूलिंग प्रॉब्लम की वजह से कई पैरेंट्स ने स्कूल से निकालकर होम स्कूलिंग शुरू कर दी है।
पड़ोस के बच्चे को देख बदला नजरिया
डॉ राहुल ने बताया कि जब वे छोटे थे तो पड़ोस में एक स्पेशल बच्चा था। वह अकेले ही रहता। मैं अक्सर उसे देखता। उसके जीवन में कोई खुशी या रोमांच नहीं था। उसी वक्त मेरे दिमाग में डिसएबिलिटी के क्षेत्र में कुछ करने की बात आई। जब मुझे इस तरह के कोर्सेस की जानकारी मिली तो मैंने पढ़ाई की और आगे बढ़ा। डॉ राहुल स्वामी विवेकानंद को फॉलो करते हैं।
इसलिए भी होती है मानसिक विकलांगता
डॉ राहुल ने बताया कि अगर कोई महिला 35 के बाद मां बनती है तो होने वाले बच्चे में मानसिक विकलांगता की आशंका रहती है। यह एज जितनी ज्यादा होगी प्रॉब्लम भी उतनी होगी। पुरुष की एज से बच्चे की सेहत में कोई खास फर्क नहीं पड़ता। दूसरा कारण है कि जिन लोगों में कजिन ब्रदर्स-सिस्टर्स में शादी होती है उनमें यह प्रॉब्लम आती है।
Published on:
13 Dec 2019 12:03 am
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