
ताबीर हुसैन @ रायपुर.एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में सक्सेस का कोई फॉर्मूला नहीं होता। क्या चल जाएगा किसी को पता नहीं होता। ये जरूर है कि अच्छी कहानी होनी चाहिए। दिल से काम किया जाए। अगर आपकी कोशिश दर्शकों को कनेक्ट कर पाई तो अच्छी चलेगी। यह कहा खोसला का घोसला के एसोसिएट डायरेक्टर, क्योंकि सास भी कभी बहू थी, बाबूल का आंगन छूटे न, कुसुम, रिश्तों से बड़ी प्रथा और प्रतिज्ञा जैसी टीवी सीरीज के कई एपिसोड का निर्देशन कर चुके जतिन रवासिया ने। वे रायपुर में एक हिंदी फिल्म डायरेक्ट कर रहे हैं।
आर्ट और कामर्स का मिक्सअप
किसी प्रोजेक्ट पर प्रोड्यूसर कितने हावी होते हैं? इस पर बोले- ऐसा नहीं है कि प्रोड्यूसर हावी हो जाएं, हां लेकिन उनके डायनेमिक अलग होते हैं। वे मार्केट को अच्छे से देखते हैं। फिल्म बनाना सिर्फ आर्ट नहीं बल्कि आर्ट और कामर्स का मिक्सअप है। प्रोड्यूसर को कई चीजें डील करनी होती हैं क्योंकि कहीं न कहीं उनका नजरिया भी प्रोजेक्ट की मार्केटिंग को जस्टिफाई करता है।
जल्दी आउटडेट होती हैं चीजें
ओटीटी के आने से एक्सपोजर बढ़ गया है। हर कोई कहीं न कहीं कुछ सोच रहा होता है और बना भी रहा होता है। ऐसे में सिमिलर्टी का खतरा बना रहता है। थिंक चेंज वेरी फास्ट के चलते पुरानी चीजों के आउटडेट होने का खतरा बना रहता है। अब वह दौर गया जब फिल्में कई साल तक शूट होती रहती थीं। इसलिए हम जो बना रहे हैं उसे जल्द से जल्द पब्लिक तक पहुंचाना होगा।
फ्रेशर्स के साथ एडवांटेज
फिल्मों में फ्रेशर्स को जरूर मौके मिलने चाहिए। उनके साथ काम करने के कई एडवांटेज होते हैं। उनके मन में किसी को सेटेस्फाई करने का डर नहीं होता। उनके मन में कुछ कुछ असुरक्षा की भावना होती है। वे फिल्म कम्पीट होते तक सरेंडर रहते हैं और सबसे बड़ी यह कि फिल्म में भी फ्रेशनेस आती है।
Published on:
05 May 2023 11:06 pm
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