
दंतेवाड़ा/रायपुर. जानलेवा ब्लू व्हेल गेम को जानने की जिज्ञासा ही पालकों और शिक्षकों के लिए परेशानी का सबब बना रहा है। यहां के हायर सेकंडरी स्कूल में 14 बच्चों के हाथों पर कट के निशान पाए जाने के बाद चौकन्ना हुए प्रशासनिक अफसरों ने शनिवार को बच्चों के साथ पालकों से भी बातचीत की। काउंसिलिंग के बाद जिला शिक्षा अधिकारी डी.समैया ने नाम बताए बगैर इन बच्चों की ओर से बताई गई बातों का खुलासा किया।
ये भी रहे मौजूद
काउंसिलिंग के दौरान पूर्व डीईओ अहिल्या ठाकुर, थाना प्रभारी आर.देवदास और विशेष पुलिस
किशोर यूनिट से आए लीलाराम गंगवेर आदि मौजूद थे।
छात्रों ने किया खुलासा
एक छात्र ने लिखा, वह फुटबॉल प्लेयर है। उसे मैसी खिलाड़ी बेहद पसंद है, इसलिए कलाई पर उसका नाम गुदवाया है। एक ने कहा, पिता शराब पीते हैं और घर आकर मां को छोडऩे व दूसरी शादी करने की बात कहते हैं। इससे परेशान होकर उसने अपनी कलाई काटी थी। कुछ ने प्रेमिका और कुछ ने दोस्ती की बात कबूल करने के लिए कट लगाए थे। 'úÓ का निशान बनाने वाले छात्र ने कहा, उसे भगवान शिव की पूजा करना अच्छा लगता है। हैरान करने वाली बात यह रही है, इतने छात्रों में से केवल दो ने माना कि वे ब्लू व्हेल गेम को जानते हैं, लेकिन उन्होंने इसे कभी सर्च नहीं किया, इसलिए खेलना तो दूर की बात है।
बालोद में पुलिस को नहीं मिला मोबाइल में लिंक
बालोद में भी पुलिस को किसी भी बच्चे के मोबाइल से ब्लू व्हेल गेम का लिंक नहीं मिला है। दुर्ग रेंज के आईजी दीपांशु काबरा ने बताया, सभी छह बच्चों के मोबाइल की साइबर एक्सपर्ट से जांच कराई गई है। इनकी हिस्ट्री भी देखी गई, लेकिन कुछ भी नहीं मिला। अब इन बच्चों के मोबाइल जांच के लिए लैब में भेजे जाएंगे।
समझाइश और हिदायत
इस स्कूल में 700 से अधिक बच्चों का नाम दर्ज है। विशेष पुलिस किशोर यूनिट से आए लीलाराम गंगवेर ने बच्चों और पालकों को समझाया और हिदायत दी कि इस तरह के काम करने से उन पर कार्रवाई भी हो सकती है। उन्होंने कहा पूरी काउंसिलिंग में बच्चों के ब्लू व्हेल गेम खेलने की बात सामने आई है। सभी स्कूलों के प्राचार्यों को बच्चों पर नजर रखने के लिए कहा गया है।
पत्रिका व्यू -जिज्ञासा में खिंच रहा बालमन
अब तक देश में कई बच्चों को उकसा कर आत्महत्या के लिए विवश करने का दावा करने वाले ब्लू व्हेल गेम के मामले में अजीबोगरीब बातें सामने आ रही हैं। हकीकत ये है, बच्चे या अन्य का इसके प्रति आकर्षण आत्महत्या करना नहीं है, बल्कि इसे जानने की जिज्ञासा है, ठीक उसी तरह कि अगर कहा जाए डिब्बा खोलना नहीं है तो उसे खोलने को चुनौती मान लिया जाता है। बच्चों से ज्यादा पालकों और शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वे हरेक बच्चे पर पैनी निगाह बनाकर रखें और किसी भी असामान्य हरकत पर उसे तुरंत संज्ञान में लें। बच्चों का मन कोमल और किसी चीज को जानने की इच्छा बेहद प्रबल होती है और इसी नैसर्गिक गुण का तथाकथित गेम से कुछ शरारती तत्व फायदा उठाने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं। उन्हें बेनकाब कर सींखचों के पीछे डालना चाहिए।
Published on:
17 Sept 2017 11:19 am
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