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जैन सिद्धांतों का पालन कर अपने आत्मा को बनाएं तीर्थ, जीवन में खुद सक्षम बनने से जुड़ जाएंगे रिश्ते-नाते

Raipur Chaturmas Pravachan: तीर्थंकर का अर्थ है- तारने वाला। तीर्थंकर को अरिहंत कहा जाता है। मूलत: यह शब्द अर्हत पद से संबंधित है।

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Make the soul a pilgrimage by following Jain principles: Praveen Rishi

जैन सिद्धांतों का पालन कर अपने आत्मा को बनाएं तीर्थ

CG Chaturmas Pravachan: रायपुर। तीर्थंकर का अर्थ है- तारने वाला। तीर्थंकर को अरिहंत कहा जाता है। मूलत: यह शब्द अर्हत पद से संबंधित है। अरिहंत का अर्थ होता है जिसने अपने भीतर के शत्रुओं पर विजय पा ली। ऐसा व्यक्ति जिसने कैवल्य ज्ञान को प्राप्त कर लिया।

अरिहंत का अर्थ भगवान भी होता है। टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन में उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने ये बातें कही। आचार्यश्री ने कहा कि तीर्थंकर बनने के लिए पार्श्वनाथ को नौ जन्म लेने पड़े। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर है। दुनिया के सबसे प्राचीन जैन धर्म का संस्थापक ऋषभदेव को माना जाता है, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे।

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वेदों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ का उल्लेख मिलता है। महावीर स्वामी ने कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति के बाद चार तीर्थों की स्थापना की साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका। यह सभी तीर्थ लौकिक तीर्थ न होकर एक सिद्धांत हैं। इसमें जैन धर्म के सिद्धांत सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय ब्रह्मचर्य का पालन करते हए अपनी आत्मा को ही तीर्थ बनाने की बात महावीर स्वामी ने बताई है।

खुद सक्षम बनेंगे तो नाते-रिश्ते जुड़ते चले जाएंगे : रावतपुरा

श्री रावतपुरा सरकार आश्रम में चातुर्मास व्रत, दिव्य अनुष्ठान प्रतिदिन सम्पन्न हो रहे हैं। एक ओर जहां राम नाम संकीर्तन की अखंड ध्वनि वातावरण को आध्यात्मिक बना रही है तो वहीं यज्ञशाला से वैदिक मंत्रोच्चार के स्वर गुंजित हैं। प्रात: प्रार्थना सभा के बाद अर्चन सम्पन्न हुआ। जिसमें बड़ी संख्या में आए श्रद्धालुओं ने पुण्य लाभ अर्जित किया। श्री सदगुरुदेव भगवान कहते हैं- आजकल मनुष्य ऐसी माया में फंसा हुआ है। जिससे निकल नहीं पा रहा है या चाहता नहीं।

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परंतु अगर वो खुद चाह ले तो कोई बंधन उसको नहीं पकड़ सकता, वह स्वयं ही अपने कारणों से बांधता है। जैसे कोई आदमी खंभे को पकड़ लें और चिल्ला चिल्लाकर कहे की जनाब यह खंभा मुझे छोड़ नहीं रहा है। ठीक वैसी ही बात है। संत शिरोमणि रविशंकर महाराज ने कहा कि यहां कोई किसी का नहीं है। सब मोह माया है। ये आप खुद ही देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं।

अगर गरीबी स्थिति है तो आपसे रिश्ता रखने से लोग कतराते हैं। अगर आप सक्षम है तो दूर-दूर से भी रिश्ते बन जाते हैं। कहने का मतलब है-आप अपने कर्तव्यों को मत भूलो बंधन में रहते हुए भी परमात्मा को मत भूलो, उसको याद करो। क्योंकि वो सत्य है और सब झूठ है, उनको पहचानों तो कल्याण होगा।

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