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दुर्लभ लूपस बीमारी व बांबे ब्लड ग्रुप से जूझ रही महिला को मिला नया जीवन, रायपुर एम्स में हुआ सफल उपचार

Raipur AIIMS: दुनिया का सबसे दुर्लभ लूपस बीमारी व बांबे ब्लड ग्रुप से जूझ रही महिला को रायपुर एम्स में नया जीवन मिला है। डॉक्टरों की टीम ने महिला का सफल उपचार किया है…

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रायपुर

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Chandu Nirmalkar

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Piluram sahu

Feb 18, 2026

Raipur AIIMS

महिला को एम्स में मिला नया जीवन ( Photo - Patrika )

Raipur AIIMS: एम्स में दुर्लभ लूपस व बांबे ब्लड ग्रुप से जूझ रही एक महिला को नया जीवन मिला। बांबे ब्लड ग्रुप रेयर ऑफ रेयरेस्ट है। रूमेटोलॉजी विभाग के डॉक्टराें ने महिला का इलाज किया। महिला अब स्वस्थ है। डिलीवरी के 6 माह बाद ही महिला काफी कमजोर हो गई थी। इससे उन्हें रूटीन के कामों भी परेशानी हो रही थी।

Raipur AIIMS: हल्का बुखार और खांसी

कोरिया जिले की 20 वर्षीय महिला को हल्का बुखार था और लगातार खांसी आ रही थी। वह अपने शिशु को गोद में ठीक से उठा नहीं पा रही थी और उसे दूध भी नहीं पिला पा रही थी। उसने डॉक्टरों को दिखाया। इस पर सीने के संक्रमण और गंभीर एनीमिया का इलाज किया गया। इसके बावजूद उसकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। उसके अत्यंत दुर्लभ बांबे ब्लड ग्रुप ने उसकी हालत को और गंभीर बना दिया।

बिना कारण रोने और हंसने लगी..

जिसके कारण रक्त चढ़ाना लगभग असंभव हो गया, क्योंकि छत्तीसगढ़ में उपयुक्त रक्तदाता मिलना बेहद कठिन था। स्थिति तब और भयावह हो गई जब उसने अपने परिवार से बात करना बंद कर दिया, बच्चे को गोद में लेने से मना करने लगी। बिना कारण रोने लगी और कभी-कभी अनुचित तरीके से हंसने लगी। शुरुआत में उसे जनरल मेडिसिन विभाग में भर्ती किया गया, जहां डॉक्टरों को सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस (एसएलई) का संदेह हुआ।

जरूरी जांच में गंभीर बीमारी की हुई पुष्टि

क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी एवं रूमेटोलॉजी विभाग के डॉ. जॉयदीप सामंता और डॉ. रश्मि रंजन साहू की जांच में गंभीर बहु-अंग लूपस से पीड़ित मिली। इसने उसके मस्तिष्क, गुर्दों, फेफड़ों और रक्त प्रणाली को प्रभावित किया था। हीमोग्लोबिन का स्तर अत्यंत कम होने और रक्तदाता उपलब्ध न होने के बावजूद, चिकित्सकों ने सावधानीपूर्वक इम्यूनोसप्रेसिव उपचार शुरू किया।

धीरे-धीरे उसके अंगों की कार्यक्षमता में सुधार होने लगा, लेकिन उसकी मानसिक स्थिति गंभीर बनी रही। इसके बाद मनोचिकित्सकों और एक न्यूरोलॉजिस्ट सहित बहु-विषयक टीम ने इलेक्ट्रोकोन्वल्सिव थेरेपी (ईसीटी) शुरू की। आठ सत्रों और दवाओं के संयोजन से वह धीरे-धीरे फिर से बोलने लगी। दो महीने के गहन उपचार के बाद उसे दिसंबर 2025 में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। फरवरी में वह पुनः ओपीडी में आई, तब आत्मविश्वास से चलती हुई और अपने शिशु को गोद में लिए हुए।