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सिटी के साकेत ने बरसों सीखी वायलिन की बारीकियां और अब नई पीढ़ी को सिखा रहे

साकेत १५ साल तक पं. झा के शिष्य रहे। गुरु के मार्गदर्शन में आईटीसी संगीत रिसर्च एकेडमी पहुंचे। वहां ७ साल स्कॉलर रहे। अजय चक्रवर्ती से काफी कुछ सीखा। कुछ दिन चेन्नई के एमएस गोपाल कृष्ण से बारीकी सीखी।

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सिटी के साकेत ने बरसों सीखी वायलिन की बारीकियां और अब नई पीढ़ी को सिखा रहे

रायपुर वायलिन एक एेसा वाद्ययंत्र है जो वेस्टर्न की उपज है लेकिन हिंदुस्तानी संगीत और साउथ म्यूजिक में इसका गहरा असर देखा जा रहा है।
यह कहना है ५ साल की उम्र से वायलिन सीखकर शहर का नाम रोशन करने वाले साकेत साहू का। वे डीडी नगर के रहने वाले हैं लेकिन इन दिनों कोलकाता में संगीत अकादमी के जरिए नई पीढ़ी को वायलिन की बारीकियां सिखा रहे हैं। १३ दिसम्बर को वल्र्ड वायलिन डे है। १५ दिसम्बर को डॉ अरुण कुमार सेन स्मृति समारोह में प्रस्तुति देने वे रायपुर आ रहे हैं। उन्होंने अपनी वायलिन यात्रा को हमसे साझा किया।

टीवी पर देखा था
साकेत के पहले गुरु रायपुर के पं. राधाकृष्ण झा हैं। साकेत के पिता तबला बजाते थे। इसलिए संगीत का माहौल घर से ही मिला। जब उन्हें पता चला कि साकेत को वायलिन में रुचि है तो वे पं. झा के पास लेकर गए। पं. झा ने पूछा कि वायलिन कहां देखा। पहले टीवी पर और आज आपके घर में, यह नन्हे साकेत का जवाब था। पं. झा को नन्हे बालक की आंखों में वायलिन की दीवानगी नजर आ चुकी थी। साकेत १५ साल तक पं. झा के शिष्य रहे। गुरु के मार्गदर्शन में आईटीसी संगीत रिसर्च एकेडमी पहुंचे। वहां ७ साल स्कॉलर रहे। अजय चक्रवर्ती से काफी कुछ सीखा। कुछ दिन चेन्नई के एमएस गोपाल कृष्ण से बारीकी सीखी।