
प्रसिद्ध लोकगायिका कविता वासनिक अपनी बेटी हिमानी के साथ। साथ में गरियाबंद एडिशनल एसपी सुखनंदन राठौड़।
राजिम से लौटकर ताबीर हुसैन
रायपुर. मैंने संगीत की कोई शिक्षा नहीं ली। 5 साल की उम्र से गा रही हूँ। स्कूल में गाते वक्त स्व खुमानलाल साव से मुलाकात हुई। उनके जरिये मैं स्व रामचन्द्र दाऊ के चंदैनी गोंदा में पहुंची। तब से लोकगीत का सफर चल रहा है। एक वक्त ऐसा भी आया जब मुझे कैंसर हो गया। मैंने इसका डटकर सामना किया। इससे उबरकर लोकसंगीत की दुनिया में लौटी। ये कहना है प्रख्यात लोक गायिका कविता वासनिक का। ऐसा कोई दिन नहीं जब रेडियो पर इनके गाने बजते न हों। वे राजिम माघी पुन्नी मेला में प्रस्तुति देने आईं थीं। इस दौरान पत्रिका से खास बातचीत में अपनी जर्नी शेयर की।
बीमारी को होने नहीं दिया हावी
मुझे सन 2008 में ब्रेस्ट कैंसर हो गया था। मैंने बीमारी को खुद पर हावी नहीं होने दिया। मुम्बई के टाटा मेमोरियल कैंसर हॉस्पिटल में 8 महीने तक इलाज हुआ। कीमोथेरेपी हुई। इलाज के दौरान हमने मुम्बई के प्रसिद्ध पर्यटन और ऐतिहासिक स्थलों का दौरा किया। एसबीआई की ओर से मुम्बई में एक व्यवस्था है जहां गेस्ट हाउस में हम ठहरे थे। चूंकि बीमारों के लिए खाना फीका-फीका बनता था। डॉक्टरों ने कहा कि इन्हें अपनी पसन्द का खाना खाने दें। इसलिए मैं खाना खुद बनाया करती थी।
मॉरल स्पोट जरूरी है
कैंसर पीड़ित व्यक्तियों के परिजनों के लिए सन्देश में कविता ने कहा, किसी भी कैंसर पेशेंट के लिए मॉरल स्पोट जरूरी है। उसको यह अहसास कराना कि तुम जल्दी ठीक हो जाओगे। रेगुलर दवा देना, उनसे बातचीत जरूरी है। मुझे फैमिली के अलावा मेरे श्रोताओं का भी स्पोट रहा।
राखी में रातभर परफॉर्मेंस दी
कैंसर के इलाज के बाद मैंने पहली प्रस्तुति राखी गांव में दी। वहां मुझे सिर्फ एक या दो गाना गाने के लिए कहा गया था। दरअसल, वे लोग चाहते थे कि मैं उस प्रोग्राम में शामिल रहूं। लेकिन ईश्वरीय कृपा ये रही कि मैं रातभर गाई।
आवाज के लिए बरतना पड़ता है एहतियात
आवाज के लिए मुझे काफी केयर करनी पड़ती है। खट्टा इग्नोर करती हूँ। ठंडा पानी नहीं पीती। एसी में नहीं रहती। कुछ पाने के कुछ त्यागना पड़ता है। इन स्थानों पर कर चुकी हैं परफ़ॉर्म- छत्तीसगढ़ के अलावा मुम्बई, दिल्ली, यूपी के कई शहरों समेत देश की अधिकांश सिटीज में परफॉर्मेंस दे चुकी हैं।
फीमेल आर्टिस्ट मिलना चुनौती
मंच चलाने में कई तरह की दिक्कतें आती हैं। इसमें सबसे बड़ी समस्या है फीमेल आर्टिस्ट का मिलना। गांव में जिन लड़कियों से घर चलते हैं उन्हें साथ में जोड़े रखना मुश्किल काम है। अभी हम यहां प्रोग्राम देने आए हैं, कुछ हफ्ते पहले ही हमारे साथ काम कर रहीं लड़कियों की शादी हो गई। हमारे कुछ कलाकारों ने गांवों में जा-जाकर गर्ल्स की तलाश की।
गीत के बोल और म्यूज़िक अच्छा होना चाहिए
मैं स्टेट बैंक में अधिकारी हूँ। इसलिए टाइम को लेकर प्रॉब्लम होती है। जब मेरे पास लोग गाने लेकर आते हैं तो मैं बोल सुनती हूँ। यह जानती हूँ कि उसका म्यूज़िक कैसा है। उसके बाद ही गाना है या नहीं तय करती हूँ। जैसा कि आपने सुना कि तीजा-पोरा के तिहार...उसमें एक भी शब्द वर्गल नहीं है। इसी तरह एक गीत आया था धनी बिना जग लागे सुन्ना..।
पति का हमेशा सहयोग रहा
मैंने बीएससी की है। मेरे पति विवेक वासनिक संगीत के क्षेत्र से हैं। हम दोनों की मुलाकात मंचीय कार्यक्रम में हुई। शादी के बाद लोकसंगीत का सफर जारी रखने और यहां तक पहंचने में पति और परिवार की अहम भूमिका रही।
मम्मी के साथ साझा करती थी मंच- हिमानी
कार्यक्रम में प्रस्तुति देने कविताजी की बेटी हिमानी वासनिक भी आईं थीं। उन्होंने हरेली को लेकर गीत प्रस्तुत किया और कार्यक्रम का संचालन भी। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि मम्मी के साथ प्रोग्राम में जाया करती थी। चूंकि मुझे माहौल ही गीत-संगीत का मिला इसलिए गायकी में आना मेरे लिए आसान रहा। मेरे पैरेंट्स ने पढ़ाई को प्रायोरिटी देते हुए कहा कि आपको अभी अपनी स्टडीज पूरी करनी है। मैंने हिदायतुल्लाह नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री ली। अब पैरेंट्स को लगा कि पढ़ाई पूरी हो चुकी है तो उन्होंने कहा कि आप गा सकती हैं। मैं प्रैक्टिस कर रही हूँ लेकिन फोकस लोकसंगीत में है।
Published on:
20 Feb 2020 01:26 am
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