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भारत की पत्रकारिता को हमें संस्कार में ढालने की जरूरत है: बलदेव भाई

CG News: पत्रकारिता नैतिक उद्यम है, भौतिक कर्म नहीं। बदलाव भारतीय जीवन पद्धति का अंग है। बदलाव करें लेकिन उसकी आत्मा न मरे। आज के पत्रकारों की कमजोरी है कि वे पढऩा और सीखना नहीं चाहते। इससे ज्ञान में परिमार्जन नहीं बल्कि जड़ता आ जाएगी।

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Raipur news हमारे ऋषियों और पुरखों ने सदा लोक कल्याण और लोक जागरण की पैरवी की है, लिहाजा भारत की पत्रकारिता को हमें संस्कार में ढालने की जरूरत है। यह बातें कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति बल्देवभाई शर्मा ने कही। वे रायपुर के बैरन बाजार स्थित आशीर्वाद भवन में बुधवार शाम छत्तीसगढ़ साहित्य एवं संस्कृति संस्थान की ओर से आयोजित कर्पूर चंद्र कुलिश स्मृति व्याख्यान में "हिंदी पत्रकारिता का बदलता परिदृश्य" विषय पर बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे।

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बल्देव भाई ने कहा कि स्वर्गीय कुलिश जी ने पत्रकारिता के जो मूल्य स्थापित किए हैं वही तो पत्रकारिता के प्राण हैं। आज मीडिया में सुविधाएं तो बहुत हैं लेकिन प्राण का अभाव है। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि इसमें कुछ भी लिखा जा रहा है। इसलिए उसकी उपयोगिता खत्म हो रही है।

इस सशक्त माध्यम का उपयोग भारत निर्माण में किया जाना चाहिए। शर्मा ने कहा कि हमें उस दिशा में बढऩा होगा जहां अखबार बोलते हों, आज लोग बोलते हैं और अखबार खामोश रहते हैं। गलत को गलत लिखने का माद्दा लाना होगा। बदलाव हो लेकिन ऐसा हो जिससे पत्रकारिता की दिशा और दशा सार्थक हो। कार्य₹म में झाबरमल्ल शर्मा के प्रपौत्र पूर्व विधायक सत्यनारायण शर्मा, साहित्यकार गिरीश पंकज, शिक्षाविद् चितरंजन कर, कान्यकुब्ज शिक्षा मंडल के अध्यक्ष अरुण शुक्ल समेत बड़ी संख्या में साहित्यकार मौजूद रहे।

कुलिशजी की पत्रकारिता में बेबाकी और साफगोई

मुख्य अतिथि लोकायुक्त टीपी शर्मा ने कहा, पत्रकार वो नहीं जो सूचना कार में दे, बल्कि वह है जो सूचनाओं को आकार दे। हर न्यूज छापना जरूरी नहीं, बल्कि अच्छी नीयत से समाज हित के लिए लिखी जाए। स्वर्गीय कुलिशजी की पत्रकारिता में बेबाकी और साफगोई थी। आज जरूरत है उनके बताए रास्ते पर चलने की, ताकि पत्रकारिता के जरिए समाज को प्रगति की दिशा में लेकर जाएं। अगर दुर्गति हो रही हो तो उसे संभालें।

स्वतंत्र और निर्भीकहो पत्रकारिता

विशिष्ट अतिथि जस्टिस अनिल शुक्ला ने कहा, आज की पत्रकारिता में तथ्यों की जगह व्यक्तिगत विचार बढ़ गए हैं। एक समय था जब खबरें बाद में पहले संपादकीय पढ़ी जाती थी, लेकिन अब पूरा समाचार पत्र पढ़ लिया जाता है सिवाए संपादकीय के। उन्होंने डिजिटल मीडिया पर प्रहार करते हुए कहा कि फेक न्यूज की भरमार देखी जा रही है, वाट्सऐप यूनिवसिर्टी तो वैमनस्यता फैला रही है। इससे न देश का भला होगा न पत्रकार का। थोड़ी देर के लिए टीआरपी भले बढ़ जाए, लेकिन ऐसी चीजें लंबी नहीं चलती। जिस तरह न्यायपालिका स्वतंत्र और निर्भीक है वैसे ही पत्रकारिता को भी रहना चाहिए।

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जो जनता की आवाज बने

अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ लेखक सुशील त्रिवेदी ने कहा, देश में जितने भी बड़े नेता हुए साहित्यकार और पत्रकार थे। बापू कहते थे कि मैं राजनीति में इसलिए आया ताकि समाज को बदल सकूं, आज तो इसका उल्टा हो रहा है। आज के अखबारों में समाज की नहीं कॉर्पोरेट की आवाज आती है। कुलिशजी को याद करना उन पत्रकारों को याद करना जो जनता की आवाज बने। उन्होंने अपनी पत्रकारिता में जिस मूलभूत पत्रकारिता की बात कही थी हमें उसे आगे बढ़ाना है।