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OMG! यहां खाते हैं लाल चींटियों की चटनी, बुखार का होता है इससे इलाज

छत्तीसगढ़ एेसे तो आदिवासी संस्कृति और प्राकृतिक धरोहर के लिए विश्व विख्यात है, लेकिन यहां की लाल चींटियां भी काफी सुर्खियां बटोर चुकी हैं।

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lal chinti ki chutney

OMG! यहां खाते हैं लाल चींटियों की चटनी, बुखार का होता है इससे इलाज

रायपुर . छत्तीसगढ़ एेसे तो आदिवासी संस्कृति और प्राकृतिक धरोहर के लिए विश्व विख्यात है, लेकिन यहां की लाल चींटियां भी काफी सुर्खियां बटोर चुकी हैं। आइए आपको इन लाल चीटियों के सुर्खियों में आने की वजह बताते हैं।

आदिवासी खाते हैं लाल चींटियों की चटनी

आपने धनिया, पुदीना या टमाटर की चटनी का स्वाद चखा होगा, लेकिन क्या लाल चींटियों की चटनी के बारे में सुना है। यह आपको अटपटी लग रही होगी, लेकिन यह सच है। यह चटनी आपको और कहीं नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के बस्तर में मिलेगी। यहां लाल चींटियों की चटनी को आदिवासी बड़े चाव से खाते हैं। बस्तर में रहने वाले आदिवासी लाल रंग की चींटियों को पेड़ों से इकठ्ठा करके चटनी बनाते हैं। इसे स्थानीय बोलचाल में 'चापड़ा' कहते हैं।

आप बस्तर के किसी पारम्परिक हाट (साप्ताहिक बाजार) में हैं तो पत्तों के दोने में लाल चीटियां बेचती दिख जाएंगी। पत्रिका ने जगदलपुर से करीब 30 किलोमीटर कांगेर घाटी के रास्ते में नानगुर हाट में लाल चीटियां बेच रही आदिवासी महिलाओं से बातचीत की तो उन्होंने बताया, हम अपने खानपान में इस चटनी का इस्तेमाल सदियों से करते आ रहे हैं। यह चटनी मेडिसिन (दवा) का काम करती है।

कई बीमारियों से बचाती है लाल चटनी
आदिवासियों का मानना है कि चापड़ा स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद है। इन चींटियों में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन के साथ ही आयरन और कैल्सियम पाया जाता है। इसके सेवन से मलेरिया, पीलिया और अन्रू जलजनित बीमारियां में आराम मिलता है। साथ ही प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होती है, जो बीमारियों से रक्षा करती है।

बुखार में करते हैं इलाज

जब किसी आदिवासी को साधारण बुखार होता है तो वे पेड़ के नीचे बैठकर लाल चींटियों से स्वयं को भी कटवाते हैं, जिससे बुखार का असर कम हो जाता है। हालांकि, चिकित्सकों के अनुसार, बुखार में यह तरीका 100 फीसदी कारगर नहीं माना जा सकता है। इन चीटियों में फॉर्मिक एसिड होने से मेडिसिन गुण होते हैं। गर्मियों में धूल और गर्म हवाओं के कारण आंखों में संक्रमण हो जाता है, जिसे ठीक करने के लिए आदिवासी इस चटना का सेवन करते हैं।

कैसे बनाते है चापड़ा
स्थानीय लोग बताते हैं, अप्रैल और मई का महीना आते ही ये लाल चींटियां जंगलों में सरगी और साल के पेड़ों के पत्तों में बड़े पैमाने पर छत्ता बनाती हैं। फिर पेड़ों पर चढ़ कर इन चींटियों को जमा कर लेते हैं। अगर इसकी चटनी बनानी हो तो उसे सिलबट्टे पर पीस कर उसमें स्वाद के अनुसार नमक और मिर्च मिलाते हैं। इससे स्वाद चटपटा हो जाता है और फिर बड़े चाव से खाते हैं। आजकल कुछ आदिवासी चटनी में लहसुन और अदरक भी मिलाने लगे हैं।