मालिक न करें फिर आना पड़े...दो पैसा कम कमाएंगे लेकिन लौटेंगे नहीं

Lockdown effect

  • आए थे कमाने, लाॅकडाउन में बचत भी खर्च हो गया, बढ़ गई उधारी
  • एमपी के सैकड़ों की संख्या में पंजाब के ड्राइवर, आपरेटर काम करने आते हर साल
  • लाॅकडाउन होते ही ठेकेदारों ने मुंह फेरा, फांकाकसी की नौबत आई तो निकल पड़े पैदल ही

राजगढ़. कोरोना वायरस के इस काल में सबसे अधिक प्रभावित वह वर्ग हुआ है, जो बेहतर भविष्य की तलाश में अपने गांव घर से सैकड़ो हजारों किलोमीटर दूर रोजगार की तलाश में गया था। वहां काम तो मिला लेकिन कमा बस इतना सका कि दो वक्त की रोटी मिल सके। लॉकडाऊन आया तो काम बंद होने के साथ ही रोटी भी दुश्वार हो गई। अब जब ये घर जाना चाहे तो सरकार ने पहुंचाने की व्यवस्था में हाथ खड़े कर लिए। जब कोई मदद को नहीं आया तो ये बेचारे अपनी व्यवस्था कर किसी तरह पैदल/साइकिल/किसी सवारी से कामकाजी शहर से अपने गांव की ओर लौट चले। किसी ने सैकड़ो किलोमीटर का सफर पैदल तय किया तो किसी ने मजदूरी से बचाए पैसे से पुरानी साइकिल खरीदी और उसी से घर की राह पकड़ ली। जिले से गुजरने वाले हाईवे से रोजाना ऐसे हजारों मजदूर निकल रहे हैं।
गांव लौट रहे मजदूर व्यवस्था से काफी आहत हैं। ‘पत्रिका’ से बातचीत में अधिकतर ने किसी तरह घर पहुंचने की इच्छा जताई है साथ ही यह भी कहा कि वह कोशिश करेंगे कि घर के आसपास ही कोई काम मिले, लौटकर आना न पड़े। आईए जानते हैं कुछ मजदूरों की कहानी उनकी ही जुबानी।

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मालिक न करें फिर आना पड़े...दो पैसा कम कमाएंगे लेकिन लौटेंगे नहीं

ठेकेदार छोड़ भाग गया, फांकाकसी को मजबूर मजदूर बोले, नहीं लौटेंगे फिर

शहर में पीएम आवास के निर्माण के लिए ठेकेदार दमोह जिले से करीब सौ मजूदरों को अपने साथ लाया था। लॉकडाऊन में काम बंद हुआ तो ठेकेदार उन्हें उनके हाल पर छोडकर चला गया। घर जाने की अनुमति के लिए मजदूरों ने कई बार कलक्ट्रेट में साहबों से गुहार लगाई लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। इधर, पैसे खत्म होने के साथ राशन भी खत्म हो चुका था। फांकाकसी से बेहतर किसी तरह गांव पहुंचना इन लोगों ने मुनासिब समझा। फिर क्या था, निकल पड़े किसी तरह अपने गांव की ओर। वापस लौटने को मजबूर ये मजदूर जाते जाते कह गए कि चाहे जो हो अब काम के लिए यहां नहीं लौटेंगे।

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पटियाला से एमपी में बीस सालों से हैं लेकिन अब नहीं आना चाहते

पटियाला पंजाब से भोपाल, होशंगाबाद, रायसेन सहित एमपी के कई जिलों में विभिन्न कृषि यंत्रों को चलाने वाले यहां आए और यहीं के होकर रह गए। सैकड़ों की संख्या में आए इन लोगों में कोई हार्वेस्टर चलाता है तो कोई कुछ। लेकिन लाॅकडाउन के बाद इनका कर्मक्षेत्र इनसे मुंह मोड़ लिया तो अब अपने गांव-जवार की याद आने लगी। भोपाल से पैदल चलकर राजगढ़ पहुंचे जसवीर सिंह, सोमनाथ, गुरमीत सिंह बताते हैं कि वह काम करने हर साल यहां आते हैं। इस बार भी 15 साथियों के साथ आए थे। लाॅकडाउन होते ही सबकुछ बदल गया। ठेकेदार ने काम बंद होते ही अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया। भोपाल से बाहर तक छोड़वा कर अपने तरीके से जाने को बोल दिया। कुछ साधन नहीं मिला तो पैदल ही निकल पडे। रास्तें में कही खाना मिला तो कहीं पानी पीकर काम चला लिया। पिछले दो महीना में जो कमाया था वह सबकुछ काम बंद होने के बाद भोपाल में ही खर्च हो गया। किसी तरह कोशिश है घर पहुंचे। अब हिम्मत नहीं कि दुबारा यहां आया जाए, आगे भगवान मालिक।

मालिक न करें फिर आना पड़े...दो पैसा कम कमाएंगे लेकिन लौटेंगे नहीं

देवास से भटिंडा तक सफर के लिए पुरानी साइकिल जुगाड़ी

देवास, उज्जैन सहित अन्य जिलों में हार्वेस्टर चलाने आए भटिंडा के ढेर सारे आपरेटर साइकिल का जुगाड़ कर गांवों की ओर निकल पड़े हैं। बीते दिनों राजगढ़ पहुंचने पर इन लोगों ने ‘पत्रिका’ से अपनी पीड़ा साझा करते हुए ऑपरेटर करनेल सिंह, गजराज सिंह, मंदिप सिंह, नायब सिंह, मिलन सिंह ने बताया कि एक महीना तक अभी काम हुआ था कि कामधंधा बंद हो गया। एक महीना में जो बचा खुचा था वह बंदी में खर्च हो गए। फांकाकसी की नौबत न आए इसलिए किसी तरह घर जाने का मन बनाया गया। ये लोग बताते हैं कि सबने रुपये जोड़कर कुछ पुरानी साइकिलें खरीदी और इसी से निकल पड़े हैं गांव की ओर। इन लोगों का कहना है कि इस बार के बेगानेपन को देखते हुए अगली बार आने के पहले दस बार सोचना पड़ेगा।

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धीरेन्द्र विक्रमादित्य
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