
सरकार की परेशानी बढ़ी: मेवाड़ के बच्चे नहीं पसंद करते फीका दूध
राजसमंद. अश्वनी प्रतापसिंह. प्रदेश में २ जुलाई से शुरू की गई अन्नपूर्णा दूध योजना का फीका दूध बच्चों के हलक से नहीं उतर रहा। पहले ही दिन कई बच्चे घरों से कॉपी-किताबों के साथ चीनी लेकर आए, जिसे चुपचाप दूध में मिलाकर पिया। कई बच्चों ने तो आधा दूध पिया और आधा चुपचाप अध्यापकों की नजर से बचाकर फेंक दिया। वहीं अध्यापकों ने बच्चों को फीके दूध की गुणवत्ता बताते हुए उन्हें पिलाने के प्रयास किए।
नहीं अच्छा लगता फीका दूध...
कक्षा छह की छात्रा निकिता, कक्षा २ का छात्र शिवसिंह, छात्र नितेश कुमार ने बताया कि उसे फीका दूध बिल्कुल पसंद नहीं है, घर में भी वह बिना चीनी डाले दूध नहीं पीता। ऐसे ही प्रत्येक स्कूल में ४० फीसदी बच्चों ने फीका दूध होने पर नाक-मुंह सिकोडक़र दूध पिया। केलवा के एक स्कूल में तो कुछ बच्चों ने आधा दूध चुपचाप फेंक दिया।
उपस्थिति से पहले कैसे तय हो मात्रा
ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों में दूध वितरण को लेकर एक पेंच और सामने आया है। स्कूल खुलने का समय सुबह ८.२० बजे हैं। ऐसे में बच्चों उपस्थिति तय होते-होते ८.३० से ८.४० तक का समय हो जाता है। जबकि स्थानीय स्तर पर पशुपालक सुबह जल्दी पशुओं का दूध निकालकर, बेंचकर खेतों पर काम के लिए चले जाते हैं। ऐसे में जिम्मेदारों को एक अनुमान के आधार पर ही दूध लेना पड़ रहा है।
मेवाड़ में फीके दूध का चलन नहीं...
मेवाड़ क्षेत्र में फीका दूध कम पसंद किया जाता है। यही आदत बच्चों में है। सोमवार को निरीक्षण के दौरान कई जगह यह समस्या सामने आई, बच्चों ने फीका दूध पीने में आनाकानी की।
-नारायणसिंह राव, सहायक, परियोजना समन्वयक
कुछ बच्चे चीनी लेकर आए...
कुछ बच्चे स्कूल में चीनी लेकर आए थे, हमने तो उन्हें फीका दूध ही उपलब्ध करवाया था, उन्होंने चीनी मिलाकर पिया है।
-कमलेश त्रिपाठी, प्रधानाचार्य, राउमावि मोही
फीका ही उपलब्ध करवाया है...
सरकार ने फीका दूध ही उपलब्ध करवाया है, लेकिन ऐसा भी आदेश जारी नहीं किया है कि इसमें चीनी नहीं मिलाई जा सकती। कई जगह भामाशाहों की मदद से संस्थाप्रधानों ने मीठे दूध की भी व्यवस्था की है, बच्चे अपने स्तर पर भी चीनी मिला सकते हैं।
-भरत कुमार जोशी, जिलाशिक्षाधिकारी (माध्यमिक) राजसमंद
Published on:
04 Jul 2018 05:41 pm
