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Rajsamand: सम्मान पर फीता काटने की राजनीति भारी, महीनों से मटमैले पर्दों में कैद महापुरुषों की मूर्तियां

Statues Covered Controversy: लोकतंत्र और सम्मान की बात करने वाली राजनीति का एक विचित्र और चिंताजनक दृश्य इन दिनों राजसमंद में देवगढ़ के प्रमुख चौराहों पर देखने को मिल रहा है।

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देवगढ़ में महापुरुषों की प्रतिमाओं पर मटमैले पर्दे,पत्रिका फोटो

देवगढ़ में महापुरुषों की प्रतिमाओं पर मटमैले पर्दे,पत्रिका फोटो

Statues Covered Controversy: लोकतंत्र और सम्मान की बात करने वाली राजनीति का एक विचित्र और चिंताजनक दृश्य इन दिनों राजसमंद में देवगढ़ के प्रमुख चौराहों पर देखने को मिल रहा है। यहां महापुरुषों की मूर्तियां महीनों से मटमैले कपड़ों में लिपटी खड़ी हैं-जैसे किसी उद्घाटन के इंतजार में नहीं, बल्कि प्रशासनिक उपेक्षा की कैद में हों।

देश की आजादी और सामाजिक न्याय के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले इन राष्ट्रनायकों की मूर्तियां आज खुद सम्मान की प्रतीक्षा में हैं। जिनके नाम पर राजनीति चमकाई जाती है, उन्हें ही फीता काटने की औपचारिकता के कारण लंबे समय से ढककर रखा गया है। हालात यह हैं कि राहगीर तक यह समझ नहीं पा रहे कि इन पर्दों के पीछे महात्मा गांधी, महाराणा प्रताप, डॉ. भीमराव अंबेडकर या अन्य महापुरुषों की प्रतिमाएं हैं, या फिर यह प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक बन चुके ढांचे।

निर्माण के साथ ही विवादों की शुरुआत

इन सर्कलों के निर्माण के साथ ही विवाद खड़े हो गए थे। पूर्व भाजपा नगर अध्यक्ष अमर सिंह चौहान सहित भाजपा और कांग्रेस के तत्कालीन पार्षदों ने पत्रों के माध्यम से आरोप लगाए कि पूर्व अध्यक्ष की व्यक्तिगत जिद के चलते बिना ठोस प्रस्ताव और बोर्ड की सर्वसम्मति के सर्कल निर्माण किए गए। शिकायतों में भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के आरोप भी शामिल रहे, जिनकी गूंज संभागीय आयुक्त से लेकर जिला कलेक्टर तक सुनाई दी।

बताया गया कि विकास के नाम पर पहले से स्थापित व्यवस्थाओं को हटाया गया और फिर जल्दबाजी में नए सर्कल व मूर्तियां मंगवाई गईं। हालांकि न तो इनके पीछे स्पष्ट वैचारिक आधार था और न ही उचित प्रशासनिक स्वीकृति। परिणामस्वरूप कई स्थानों पर मूर्तियां स्थापित तो कर दी गईं, लेकिन विवादों के कारण उन्हें सार्वजनिक रूप से अनावरण करने का साहस नहीं दिखाया गया।

बोर्ड गया, पर ‘शुभ मुहूर्त’ अब भी बाकी

नगरपालिका बोर्ड का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, लेकिन चौराहों पर खड़ी मूर्तियां अब भी किसी ‘शुभ मुहूर्त’ की प्रतीक्षा में ढकी हुई हैं। यह स्थिति सवाल खड़े करती है कि क्या महापुरुषों का सम्मान केवल राजनीतिक अवसरों तक सीमित है? महाराणा प्रताप, महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर और माँ पन्नाधाय जैसे राष्ट्रनायकों को किसी दल या गुट से जोड़कर देखना उनकी गरिमा के साथ अन्याय है। उन्हें महीनों तक कपड़ों में ढंककर रखना न केवल उनका अपमान है, बल्कि उस विचारधारा की भी अवहेलना है, जिसके लिए उन्होंने अपना सर्वस्व समर्पित किया।

जनता का सीधा सवाल: सम्मान या राजनीति?

उपखंड अधिकारी से लेकर जिला स्तर तक शिकायतों के बावजूद हालात जस के तस बने हुए हैं। देवगढ़ की जनता अब इस स्थिति से आक्रोशित है और जवाब मांग रही है क्या महापुरुषों का सम्मान भी अब राजनीति की भेंट चढ़ चुका है? यदि जल्द ही इन मूर्तियों को अनावरण कर सम्मानजनक स्थान नहीं दिया गया, तो यह प्रकरण देवगढ़ के इतिहास में एक ऐसे उदाहरण के रूप में दर्ज होगा, जहां राजनीति ने राष्ट्र नायकों की गरिमा पर भारी पड़ने का काम किया।