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देखिए एक वर्तमान जनप्रतिनिधि की दयनीय स्थति, किस्मत ने जितना दिया, उससे भी ज्यादा छीन लिया, बरगद के पेड़ के नीचे बनाते हैं खाना

रिपोर्ट- रतनलाल जाट% मददगार ही बन गया याचक, पत्नी-तीन बच्चे एक-एक कर गुजर गएअब न घर है, न घर वाले, वार्डपंच काट रहा सराय में जिंदगी
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rajsamand hindi news

देखिए एक वर्तमान जनप्रतिनिधि की दयनीय स्थति, किस्मत ने जितना दिया, उससे भी ज्यादा छीन लिया, बरगद के पेड़ के नीचे बनाते हैं खाना

राजसमंद. मनहूस जिन्दगी में वक्त कई बार किरदार बदल देता है। जिस व्यक्ति को लोगों ने दूसरों की मदद के लिए चुना, वह खुद दया का मोहताज बन गया है। जिन्दगी खुशहाल बनाने के लिए किस्मत ने अद्र्धांगिनी और घर-आंगन में तीन बच्चे दिए और एक-एक कर सबको छीन लिया।
यह दर्दभरी दास्तां राज्यावास पंचायत के तेजपुरा वार्डपंच मांगीलाल पुत्र दौलतराम भील की है। वह एक भटकती जिंदगी काट रहे हैं। कई वर्षों से एक दिन किसी सराय में, तो दूसरे दिन किसी और जगह रात गुजारने को मजबूर है। न घर है, न घरवाले हैं। ऐसी दयनीय स्थति से वार्डपंच ने कई मर्तबा पंचायत और जिला मुख्यालय के अधिकारियों को अवगत कराया, लेकिन किसी ने उनकी सुनवाई नहीं की। वार्डपंच एक पैर से विकलांग है। वह कोई कठिन काम नहीं कर पाते हैं। दोनों समय का भोजन बड़े पेड़ के नीचे पत्थरों का चूल्हा बनाकर तैयार करते हैं और अपना पेट पाल रहे हंै।

छोड़ा तंबू, अब सराय में
आखिरी सहारा छिन जाने के बाद वार्डपंच ने तंबू छोड़ दिया। अब वह गांव की सार्वजनिक सराय में रहकर रात गुजार लेता है। दिन में किसी बड़े पेड़ के नीचे जाकर खाना बनाता है।

स्वीकृति के बाद भी नहीं बना मकान
वार्डपंच ने सरपंच और अधिकारियों पर आरोप लगाया कि उसके नाम से मकान स्वीकृत हो चुका है, उसके बाद भी मकान बनाने नहीं दिया जा रहा है। कई बार पंचायत से लेकर मुख्यालय तक चक्कर काट लिए, लेकिन किसी ने उसकी नहीं सुनी। कई बार जनप्रतिनिधियों को अवगत कराया, लेकिन आश्वासन के सिवाय कुछ नहीं मिला।

हंसता-खेलता परिवार उजड़ गया
पूर्व वार्डपंच की शादी करीब तीन दशक पूर्व हुई। पत्नी लक्ष्मी देवी ने दो लडक़ों और एक लडक़ी को जन्म दिया। किशन, गीता और नारायण के जन्म के बाद लक्ष्मी चल बसी। बच्चों से लेकर घर की सारी जिम्मेदारी मांगीलाल के सिर पर आ गई। विकलांग होने के बावजूद जैसे-तैसे मजदूरी करके अपने बच्चों को बड़ा किया, लेकिन किस्मत में जब दुख ही लिखा हो तो कोईक्या करे। पत्नी की मौत के दस साल बाद लाडली गीता भी किसी बीमारी के चलते भगवान को प्यारी हो गई। मांगीलाल ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी। मेहनत-मजदूरी से इतने पैसे भी नहीं कमा पाता था कि खुद के लिए एक छत बना सके। खुद और बच्चों के लिए वह एक तंबू तानकर काम चलाता रहा।

दोनों ‘लाठियां’ भी टूट गईं
एक माह पूर्व वार्डपंच के बुढ़ापे के सहारे पर काल मंडराया। बड़ा बेटा नारायण भी चल बसा। मांगीलाल अपने छोटे बेटे की मौत का गम भुला भी नहीं पाया कि बड़ा बेटा किशन भी दो माह पहले किसी लम्बी बीमारी के चलते जान गवां बैठा। अब पूरे परिवार में वह अकेला रह गया। पूरी जिंदगी तबाह सी हो गई लगती है। एक तरफ गरीबी, दूसरी ओर गहराता बुढ़ापे का अंधेरा। इस अंधेरे की तीनों रोशनियां बुझ चुकी हैं।

डर भी बना रहता है
मांगीलाल ने बताया कि घर नहीं है और बारिश के दिन है। तंबू में पानी टपकता है। कई बार सांप तंबू के अंदर घुस आए। डर के मारे तम्बू में रहना छोड़ दिया। सराय में रहते हैं। वहां भी बिजली नहीं है। तेजपुरा से ही एक व्यक्ति पूर्व जिला प्रमुख भी रहे हैं, लेकिन एक वार्डपंच की सुनने वाला कोईनहीं है।