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राजस्थान के इस शहर में कबूतरों के लिए भी रखा जाता है हिस्सा…पढ़े पूरी खबर

जिला मुख्यालय में तीन स्थानों पर कबूतर खाने बने हुए हैं। काश्तकार अपनी उपज में से कुछ हिस्सा कबूतरों के लिए रखते हैं। समिति के माध्यम से एवं मंदिर के माध्यम से भी कूबतरों के लिए दाना उपलब्ध कराया जाता है।

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धोईंदा में बना कबूतर खाना और उसमें बैठे कबूतर

राजसमंद. सभी धर्मो में दान का विशेष महत्व होता है। कोई भी अच्छे कार्य के सिद्ध अथवा पूर्ण होने पर कबूतरों को दाना और गायों का चारा डलवाया जाना हमारे यहां आम बात है। काश्तकर अपने खेतों में बोई फसल में से कुछ हिस्सा इनके लिए निकालते हैं। सामाजिक कार्यो के दौरान कबूतरों के नाम से दाना और चारा आदि डलवाने का संकल्प दिलाया जाता है। ऐसे ही शहर में तीन स्थानों पर कबूतर खाने बने हैं। इनमें सैकडों कबूतर रहते हैं। इन कबूतर खानों में इनके दाना-पानी और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम है। कबूतरों को 50 से 100 किलो तक प्रतिदिन मक्का अथवा गेहूं डाला जाता है। इसमें मुख्य बात यह है कि कबूतरों को नियमित रूप से दाना आदि डालने का कार्य सेवाभाव के रूप में आस-पास के दुकानदार ही करते हैं। कबूतर खानों में दाना आदि रखने के लिए गोदाम भी बने हुए हैं। इन्हें इस तरह से बनाया गया है कि उसमें बिल्ली अथवा कोई जानवर नहीं घुस सकता है। मुख्य गेट हमेशा बंद रखा जाता है। इसके कारण कबूतर भी महफूज रहते हैं। जानकारों के अनुसार कबूतर को शांति और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। पक्षी को दाना खिलाने से कई तरह के दोष भी दूर होते हैं और तरक्की के मार्ग खुलते हैं। इसके कारण कबूतरों को दाना डाला जाता है।

राजनगर फव्वारा चौक कबूतर खाना

राजनगर के फव्वारा चौक के निकट वर्षो पुराना कबूतर खाना है। यहां पर नियमित रूप से कबूतरों को प्रतिदिन दाना डाला जाता है। दुकानदारों ने बताया कि वर्तमान में गेहूं की कटाई आदि का कार्य जारी है। ऐसे में इन्हें पर्याप्त मात्रा में दाना उपलब्ध होने के कारण वर्तमान में प्रतिदिन 30 किलो मक्का अथवा गेहूं डाला जाता है, जबकि अन्य दिनों में 50 किलो करीब प्रतिदिन डाला जाता है। उन्होंने बताया कि काश्तकार दाना रख जाते हैं और समाज के लोगों की ओर से दाना उपलब्ध कराया जाता है।

धोईंदा में करीब 30 साल पुराना कबूतर खाना

धोईंदा में मंदिर के पास कबूतर खाना बना हुआ है। इसका निर्माण यहां के कारीगरों ने मिलजुल कर किया है। शंभूलाल और नानाराम कुमावत ने बताया कि प्रतिदिन एक क्विंटल दाना कबूतरों को नियमित रूप से डाला जाता है। दाने का इंतजाम ग्रामीणों के सहयोग से, समिति के माध्यम से किया जाता है। इसके बावजूद दाना कम पडऩे की स्थिति में खजूरिया श्याम मंदिर में सूचना देने पर वहां से पिकअप भरकर दाना कबूतर खाने में पहुंच जाता है। यह क्रम कई वर्षो से चल रहा है।

100 फिट के निकट भी है कबूतर खाना

शहर के 100 फिट रोड के निकट तुलसी विहार में नया कबूतरखाना बनाया गया है। हालांकि इसका निर्माण कुछ वर्षो पहले ही हुआ है। यहां भी कबूतर रहते हैं, लेकिन यह एकांत में होने के कारण ज्यादातर लोगों को इसकी जानकारी नहीं है। यहां पर कबूतरों के दाने आदि की व्यवस्था की जाती है।

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