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कुंभलगढ़ अभयारण्य में बाघ लाने की तैयारी!
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कुंभलगढ़ अभयारण्य में बाघ लाने की तैयारी!

विभाग ने 50 हेक्टयर में इनक्लोजर बनाने के प्रस्ताव बनाए, 2 करोड़ 10 लाख होंगे खर्च-पूर्व में बनाया था 12 हेक्टयर का प्रस्ताव, बाघ आने से पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा, इनक्लोजर में बाघ टी-24 को स्थानांतरित करने की है तैयारी
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अश्वनी प्रतापसिंह @ राजसमंद. वन्यजीव प्रेमियों के लिए अच्छी खबर है। अगर सबकुछ ठीक रहा तो शीघ्र ही कुंभलगढ़ अभयारण्य में आपको बाघ दिखेगा। वनविभाग ने इसका खाका तैयार कर लिया है, अनुमति मिलते ही करीब 50 हेक्टयर क्षेत्र में इनक्लोजर (चारदिवारी कर बाघ के लिए संरक्षित) बनाया जाएगा। इसमें उदयपुर के जन्तुआलय से बाघ टी-24 को शिफ्ट किया जाएगा। इनक्लोजर बनाने आदि में करीब 2 करोड़ 10 लाख रुपए खर्च होने का अनुमान है। इससे पूर्व विभाग की ओर से 12 हेक्टयर क्षेत्र में इनक्लोजर बनाने का प्रस्ताव भेजा गया था, बाघ के लिए यह जगह अपर्याप्त मानते हुए अब ज्यादा जगह का प्रस्ताव तैयार किया गया है।


अंदर ही होगी भोजन-पानी की व्यवस्था
इनक्लोजर को दीवार व तारबंदी के जरिए बंद किया जाता है, जिससे वन्यजीव बाहरी लोगों के सम्पर्क से दूर रहे। इसे जंतुआलय की तरह ही संरक्षित किया जाता है। इसमें रखे गए वन्यजीव को अंदर ही भोजन-पानी की पर्याप्त व्यवस्था, उसकी स्थिति के अनुसार उपलब्ध करवाई जाती है। अगर वह स्वयं शिकार करने में सक्षम होता है तो उसके शिकार की व्यवस्था की जाती है, अगर वह कमजोर या वृद्ध होता है तो बाहर से भोजन उपलब्ध करवाया जाता है।


टी-२४ को शिफ्ट करने की तैयारी
वनविभाग के सूत्रों के अनुसार बायोलॉजिकल पार्क उदयपुर में बीमार चल रहे बाघ टी -24 को यहां शिफ्ट किया जाएगा। वह गत नवंबर में इडियोपैथिक मेगाकॉलन से ग्रसित हुआ था।
इस बीमारी का कोई स्थाई इलाज नहीं हैं और मॉनिटरिंग करके ही उसे ठीक रखा जा सकता है। क्योंकि उसे कब्ज की समस्या से निजात के लिए समय-समय पर दवाइयों की आवश्यकता पड़ती है। बायोलॉजिकल पार्क में बाघ के लिए पर्याप्त जगह भी नहीं है, ऐसे में अगर उसे इनक्लोजर में रखा जाएगा तो खुले वातावरण से उसे ज्यादा फायदा मिलेगा।


2 करोड़ का होगा खर्च
इनक्लोजर बनाने केलिए पूर्व में विभाग ने कुंभलगढ़ अभयारण्य के रणकपुर क्षेत्र को चुना था, यहां 12 हेक्टयर भूमि पर 80 लाख रुपए की लागत से इसे मूर्त रूप देने का खाका तैयार किया गया, लेकिन विभाग के आलाधिकारियों ने यह क्षेत्र बाघ के लिए छोटा बताकर इसे रद्द कर दिया। अब विभाग ने अभयारण्य क्षेत्र में ही 50 हेक्टयर भूमि पर इनक्लोजर बनाने का प्रस्ताव तैयार किया है। इसमें करीब 2 करोड़ 10 लाख का खर्च आएगा।


पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा
कुंभलगढ़ अभयारण्य में बाघ के आने से पर्यटकों का रुझान काफी बढ़ेगा क्योंकि अभी यहां वन और वन्यजीव देखने जो भी पर्यटक या वन्यजीव प्रेमी आते हैं, उन्हें पैंथर, भालू सहित अन्य वन्यजीव नजर नहीं आते हैं, जिससे उन्हें निराश होना पड़ता है। ऐसे में एक चिह्नित जगह पर अगर पर्यटकों को बाघ दिखेगा तो निश्चिततौर पर पर्यटकों का रुझान बढ़ेगा।


मुकंदरा हिल्स की तरह कुंभलगढ़ अभयारण्य में भी रह सकते हैं बाघ
कोटा दर्रा के मुकंदरा हिल्स को राष्ट्रीय अभयारण्य घोषित किए जाने के बाद टाइगर रिजर्व की लाइफ लाइन माना जाने लगा। कुंभलगढ़ अभयारण्य में भी तीन जिलों की सीमा को मिलाकर 528.72 वर्ग किलो मीटर का विशाल जंगल है। इसकी उत्तरी सीमा करमाल चौराहे से कामलीघाट चौराहे के आगे तक तथा दक्षिण वन खंड भगोडा के दक्षिण भाग को शामिल करती हुई है। वहीं पूर्वी सीमा पाली एवं राजसमंद को भी सीमांकित करती हुई बाघाना से सेवंत्री होकर मामा देव तक है। दक्षिण सीमा वनखंड मामा देव से शुरू होकर बूझ, वनखंड मजावाड़ा के आगे तक तथा पश्चिमी सीमा, वनखंड भगोड़ा (आरक्षित वन) की पश्चिमी सीमा ग्राम गुडागाग तक है। ऐसे में अगर सरकार स्तर पर प्रयास किए जाएं तो इस अभयारण्य को भी टाइगर रिजर्व किया जा सकता है। क्योंकि यहां शाकाहारी और भालू, पैंथर जैसे मांसाहारी वन्यजीव लम्बे समय से रह रहे हैं।


हमारे अभयारण्य में इन वन्यजीवों की अधिकता
वन्य प्राणियों के संरक्षण, वृद्धि एवं उनके विकास तथा पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से राज्यसरकार ने नवम्बर २०११ को वन्यजीव सुरक्षा अधिनियम १९७२ की शक्तियों का उपयोग करते हुए पाली, उदयपुर व राजसमंद जिले की वनभूमि को मिलाकर राष्ट्रीय अभयारण्य (नेशलन पार्क) घोषित करने का नोटिफिकेशन जारी किया, इसके बाद इस भूमि में काबिज लोगों से दावे मांगे गए। जिसमें तीनों जिले से 319 दावे भूमि के तथा 37 धार्मिक स्थलों के आए थे। अब इन दावों के निस्तारण का काम अंतिम चरणों पर है। इससे शीघ्र ही यह राष्ट्रीय अभयारण्य बन जाएगा।


यह है वन्यजीव
कुंभलगढ़ और रावलीटाडगढ़ में एक दर्जन से अधिक प्रजाति के मांसाहारी तथा दो दर्जन से अधिक प्रजाति के शाकाहारी वन्यजीव हैं। जिसमें पैंथर, सियार, जरख, लोमड़ी, भेडिय़ा, बिल्ली, भालू, बिज्जू, नेवला साधारण, नेवला (कालीपूंछ), भारतीय लोमड़ी आदि मुख्य रूप से वन्यजीव गणना में दिखाई देते हैं। वहीं शाकाहारी में साम्भर, चिंकारा, चौसिंगा (भेडल), रोजड़ा, जंगली सूअर, सेही, लंगूर, खरगोश, चीतल सहित दो दर्जन से अधिक शाकाहारी वन्यजीव नजर आते हैं, लेकिन सफारी मार्ग पर यह दिखाई नहीं देने से पर्यटकों को निराशा होती है।


प्रस्ताव बना रहे हैं…
बाघ लाना या नहीं लाना सरकार के स्तर का काम है। उदयपुर जन्तुआलय में बीमार चल रहे बाघ टी-24 को अस्थाई रूप से इनक्लोजर में रखने की कवायद चल रही है, इसके लिए हम प्रस्ताव तैयार कर रहे हैं। पूर्व में प्रस्ताव बनाकर भेजा था, उसमें जगह काफी कम है, इसलिए अब दूसरा प्रस्ताव तैयार किया गया है।
-फतेहसिंह राठौड़, डीएफओ, राजसमंद