
महंत ने राठौड़ का शेखावत से कराया परिचय और मिल गया टिकट
राजसमंद. राजनीति में आना और हार-जीत किस्मत का खेल है। यही खेल किस्मत ने कुछ जाने-पहचाने चेहरों के साथ तब खेला, जब लोग उनसे अनजान थे। अचानक पार्टियों ने पैराशूट खोला और उतार दिया चुनावी मैदान में। किसी को हार मिली, तो किसी ने जीत का स्वाद चखा। कुछ लोग अब भी मैदान में डटे हैं। राजसमंद जिले की चटपटी राजनीतिक किस्सागोई की शुरुआत 1977 में हुई, जब उदयपुर निवासी गोविन्द सिंह शक्तावत को भाजपा ने अचानक कुम्भलगढ़ सीट से टिकट दे दिया। उन्हें खुद भी ऐसी उम्मीद नहीं थी। वह पार्टीके एक सामान्य कार्यकर्ता थे। भैरोंसिंह शेखावत व भानु कुमार शास्त्री गुट के माने जाते थे। पहला ही चुनाव 11381 मतों से जीत गए। आपातकाल के बाद जनता पार्टी की लहर से मदद मिली। उसके बाद किस्मत ने साथ नहीं दिया। 1980 में इसी सीट से कांग्रेस के हीरालाल देवपुरा के सामने लड़कर 4637 मतों से और 1990 में दूसरी बार देवपुरा से 2860 मतांतर से हार गए।
मार्बल कारोबारी पर दांव नहीं चला
राजसमंद सीट पर 2008 में कांग्रेस के प्रबल दावेदारों की बजाय मार्बल कारोबारी हरिसिंह राठौड़ को अप्रत्याशित ढंग से मैदान में उतारा गया, लेकिन यह दांव उल्टा पड़ गया। राठौड़ 2013 में भी दूसरी बार चुनाव हार गए। इससे पहले 1985 में राजसमंद में पूर्व मंत्री के नाते नानालाल वीरवाल का टिकट लगभग पक्का माना जा रहा था। आखिरी वक्त पर इसे बदलकर पैराशूट से मदनलाल चौहान को उतार दिया। नया चेहरा और इंदिरा गांधी के निधन के बाद सहानुभूति की लहर में वह उस चुनाव में राजस्थान में सर्वाधिक मतों (28608) से जीतने वाले प्रत्याशियों में शामिल हो गए।
विकल्प की तलाश में राठौड़ को चुना
कुम्भलगढ़ से लगातार दो बार शक्तावत के हारने पर विकल्प की तलाश शुरू हुई। सुरेन्द्र सिंह राठौड़ मार्बल व्यवसायी थे और राजनीति से ज्यादा सरोकार नहीं था। तब रोकडिय़ा हनुमान के महंत नारायणदास ने मुख्यमंत्री रह चुके भैरों सिंह शेखावत से राठौड़ का परिचय करवाया और टिकट मांगा। शेखावत को राठौड़ की उम्मीदवारी रास आ गईऔर टिकट फाइनल हो गया। जनता के लिए यह अप्रत्याशित निर्णय था। राठौड़ को युवा और नया चेहरा होने का फायदा मिला और उन्होंने पूर्वमुख्यमंत्री हीरालाल देवपुरा को 126 20 मतों के बड़े अंतर से हराया। 1998 में देवपुरा ने और 2003 में राठौड़ ने एक-दूसरे को पटखनी दी। राठौड़ दूसरे कार्यकाल में सिंचाई राज्यमंत्री भी बने।
विधायक का टिकट काट उतारा था दूसरे गुट का प्रत्याशी
1990 के चुनाव में तत्कालीन कांग्रेस विधायक सीपी जोशी का टिकट कटने से सबको हैरत हुई। उस समय मेवाड़ में सीपी जोशी उभरते सितारे थे और पार्टीमें डॉ. गिरिजा व्यास का दबदबा था। गिरिजा गुट के माने जाने वाले वयोवृद्ध कार्यकर्ता किशन त्रिवेदी को पार्टी ने टिकट दे दिया और वह भाजपा के शिवदान सिंह चौहान से 6 8 78 मतांतर से मात खा गए। उस चुनाव में आदिवासी मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए 'फूल वाली कांग्रेसÓ का नारा दिया था।
दो बार के विधायक हुए मैदान से बाहर
राजसमंद सीट पर भाजपा से दो बार जीत चुके तत्कालीन विधायक शांतिलाल खोइवाल का 1998 में टिकट काटकर हीरालाल रेगर को चुनाव लड़वाया। रेगर को सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिलवाकर भाजपा ने टिकट थमाया, लेकिन वह हार गए। खोइवाल ने इसी चुनाव में बगावत कर दी थी और वह 16 हजार वोट हासिल करने में सफल रहे। कांग्रेस के बंशीलाल गहलोत को इसका फायदा मिल गया और वह विधायक बन गए।
Updated on:
19 Oct 2018 10:04 pm
Published on:
19 Oct 2018 10:04 pm
