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‘दूसरों को हराकर जीतने की बजाय खुद की नकारात्मकता से पाएं आजादी’

पत्रिका-40 अंडर-40 पावर लिस्ट में शामिल राजसमन्द की फैशन डिज़ाइनर धोली से बातचीत  
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'दूसरों को हराकर जीतने की बजाय खुद की नकारात्मकता से पाएं आजादी'

'दूसरों को हराकर जीतने की बजाय खुद की नकारात्मकता से पाएं आजादी'

राजसमंद. भरतपुर के छोटे से गांव में पैदा हुई, बचपन की अच्छी-बुरी यादों के साथ पली-बढ़ी और राजसमन्द में आकर अपना एक खास मुकाम बनाने वाली फैशन डिज़ाइनर धोली के संघर्ष की टूटकर फिर खड़े होने की अपनी एक कहानी है। 10 साल की उम्र में शादी, 18 साल में तीन बच्चों की मां बनना एक अनचाहा अनुभव था, लेकिन आज वह हज़ारों महिलाओं के लिए एक उत्प्रेरक बनकर उभरी हैं। एक वक्त सबकुछ हार चुकीं धोली के पास सफलता गिनाने को बहुत कुछ है। पत्रिका-40 अंडर-40 पावर लिस्ट में शामिल राजसमन्द की फैशन डिज़ाइनर धोली से आजादी के अमृत महोत्सव पर जिन्दगी के झंझावतों से लड़कर आजाद होने की उनकी प्रेरक कहानी जानते हैं उन्हीं की जुबानी।


सवाल : आपकी कामयाबी की एक प्रेरणादायी कहानी है, ऐसे में समाज आपसे क्या उम्मीद रखता है?
मेरी कहानी में समाज के संघर्षशील लोगों के लिए एक सीख है, खासकर उन महिलाओं के लिए, जो अपने सपने पूरा करने के लिए कैसे संघर्ष कर सकती हैं, कैसे अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं। मैं कहां से कहां पहुंची, इस कहानी से समाज में अच्छा संदेश जाएगा।

सवाल : आपका सफर कैसे शुरू हुआ और किस तरह आपने यह फील्ड चुना?
जवाब : मैं भरतपुर में पैदा हुई। 10 साल की उम्र में मेरी शादी कर दी गई। पढ़ाई का सपना अधूरा रह गया। कई मुश्किलें झेलीं। फिर मैंने सोचा, जिन्दगी में कुछ करना है। 8 साल मैंने मायके में गुजारे। 18 साल की हुई, तब तक तीन बच्चों की मां बन गई। हालात ऐसे बने कि मुझे गांव छोड़कर राजसमंद आना पड़ा।

सवाल : कैसे आपने फैशन डिजाइनिंग से जुड़कर जिन्दगी का नया अध्याय शुरू किया?
जवाब: मैं निकल पड़ी थी। यह भी नहीं सोचा कि कहां जा रहे हैं, क्या करेंगे, कहां रहेंगे, गुजारा कैसे होगा। यहां आकर पांच साल तक घर पर बैठी रही। कभी सोचती थी कि महिलाओं के शृंगार सामग्री की दुकान लगाऊं, कभी कुछ और सोचती थी। किसी में कामयाबी नहीं मिली। मैंने बचपन से सिलाई का काम सीखा था, जिसे आगे बढ़ाने की सोची। एक दिन बेटे ने यू-ट्यूब पर एक वीडियो दिखाया, जिसमें एक महिला सिलाई कार्य सिखा रही थी। बेटे ने मेरा चैनल बनाया, रोजाना काम करते हुए वीडियो बनाकर अपलोड किए और उसके कुछ साल बाद 15 लाख सब्सक्राइबर्स हो गए। शुरुआत में नहीं पता था कि यहां से पैसे भी कमाए जा सकते हैं।

सवाल : कितने बुरे दिन देखे और हालात किस कदर खराब हुए?
जवाब : गांव में ऐसे हालात थे कि कभी कुछ खाने को नहीं मिलता था, कभी पानी पीकर ही सो जाते थे। 10 रुपए में पूरी एक ड्रेस सीलकर घर का गुजारा कर रही थी। राजसमंद आने के बाद काम मिलना बंद हो गया। यहां कोई मुझे और मेरे काम को जानता नहीं था।

सवाल : आपने खुद के और लोगों के लिए काम किया, समाज के लिए अपना सबसे बड़ा योगदान क्या मानती हैं?
जवाब : मैंने सोशल मीडिया के जरिए लोगों को सिलाई सिखाई तो कमेंट्स आने लगे। इससे मुझे हौसला मिला। भारत ही नहीं, कनाडा, अमरीका और दूसरी जगहों से महिलाओं व पुरुषों ने मेरे काम को सराहा और बताया कि उन्होंने भी मुझसे सीखकर अपना बिजनेस शुरू किया। वे रेडिमेड कपड़े सीलकर ऑनलाइन बेच रहे हैं। हजारों महिलाएं मेरी क्लास से जुड़ती हैं। यू-ट्यूब के अलावा मेरा एक मोबाइल एप्प भी बनवाया, जहां महिलाएं व पुरुष क्लास से जुड़कर सीखते हैं और बिजनेस चला रहे हैं।

सवाल : अपने शहर और राज्य के विकास के लिए आपकी नजर में क्या रोडमैप होना चाहिए, क्या बाधाएं हैं, उनका समाधान क्या है?
जवाब : सबसे बड़ी बाधा लड़कों की तुलना में लड़कियों को सम्मान नहीं है। लड़कियों की शिक्षा सबसे अहम पहलू है। दूसरा बाल विवाह, जिसे मैंने खुद भोगा। इसे लेकर ठोस काम हो। सरकार आकलन करे कि प्रतिवर्ष लड़के-लड़कियों का कितने एडमिशन हो रहे हैं, अंतर कितना है, क्यों हैं। बच्चियों को छोटी उम्र में ही घर के कामों में लगा दिया जाता है। ऐसा नहीं हो।

सवाल : फैशन डिजाइनिंग से आप जुड़ी हैं, इसका भविष्य कैसे देखती हैं, क्या नए बदलाव होने वाले हैं?
जवाब : भारत में विदेशी फैशन का बोलबाला है, जबकि भारतीय फैशन और खासकर राजस्थानी पैटर्न में बहुत सम्भावनाएं हैं। हमारी संस्कृति व परम्पराओं से जुड़े फैशन को नहीं भूलें। मॉडर्न कल्चर के साथ अपनी कल्चर को भी बढ़ावा दें।

सवाल : आप अपने क्षेत्र में क्या योगदान दे सकते हैं, फैशन में क्या बदलाव होने चाहिए?
जवाब : सरकार मुझे सहयोग करे तो मैं हर स्कूल में बच्चियों के लिए निशुल्क फैशन डिजाइनिंग का पाठ्यक्रम बनाकर दे सकती हूं। इसे सिलेबस में शामिल किया जाए तो मुझे लगता है हजारों बच्चियां भविष्य संवार सकती हैं। जो कभी पढ़ नहीं सकी, ऐसी महिलाएं भी इंडियन कल्चर कोर्स से सीखकर खुद के लिए व व्यापार के लिए कपड़े सील सकती हैं।