
गड़ाधन निकालने के लिए खुर्द-बुर्द की इमारत
राजसमंद. स्वतंत्रता के इतिहास से जुुड़े छापर का साक्षी रकमगढ़ भी खंडहर होकर मनचलों और समाज कंटकों का अड्डा बनकर रह गया है। यहां दिन में मनचलों तथा शाम को समाज कंटकों को आसानी से देखा जा सकता है। गढ़ के पास शराब की टूटी बोतलें, दीवारों में अंकित शब्दावली मनचलों की चहल कदमी की गवाह बनी हुई हैं। गढ़ का कोठारिया रियासत से जुड़ाव होने के कारण लोग इमसें आज भी धन की तलाश के लिए आते हैं, जिसके चलते जगह-जगह लोगों ने दीवारों, फर्श व नींव तक में गड्ढे कर दिए हैं। इससे यह खुर्द-बुर्द हो रहा है।
ऐसा पड़ा रकमगढ़ नाम
कोठारिया रियासत के रकमदेवसिंह चौहान के नाम पर इसका नाम रकमगढ़ रखा गया। बताया जाता है कि रकमदेवसिंह ने इसे जंगल में अपने क्षेत्र की रखवाली के लिए चौकी के रूप में बनवाया था। हालांकि इसका भी कोई लिखित इतिहास सामने नहीं आया है।
यह है स्थिति
वर्तमान में गढ़ देखने में खंडहर नुमा इमारत लगती है। कथिततौर पर धन के कारण लोगों ने इसे जगह-जगह से खोद दिया है। (अभीतक कोई सही जानकारी सामने नहीं आई है कि किसी को यहां से धन प्राप्त हुआ है) जिससे कई जगह इसकी नींव क्षतिग्रस्त हो गई है। साथ ही इसकी सीढिय़ां भी क्षतिग्रस्त हैं। प्रथम तल की दो तथा द्वितीय तल की एक सीढ़ी टूट कर हट गई है, द्वितीय तल की एक सीढ़ी के नीचे की पट्टी टूटी हुई है। दीवारों पर जगह-जगह मनचलों द्वारा खुरचकर नाम आदि लिखा गया है। नीचे के एक कमरे में चमगादड़ों का ढेरा है। बाहर फर्श पर झाडिय़ा उगी हैं तथा जगह-जगह शराब की टूटी बोतलों के कांच फैले हैं।
मिल सकती है पहचान...
छापर की पहचान को बनाए रखने के लिए अगर गढ़ को ही स्मारक के रूप में विकसित कर दिया जाए तो गढ़ की पहचान भी बनी रहेगी, और आने वाली पीढ़ी छापर के इतिहास को भी जान सकेगी। साथ ही वर्ष में यहां एक दो ऐसे आयोजन भी किए जा सकते हैं, जिससे लोगों का जुड़ाव बना रहे।
-दिनेश श्रीमाली, १९९७ में बनी कमेटी के सदस्य
Updated on:
14 Aug 2018 12:05 pm
Published on:
14 Aug 2018 12:05 pm
