
डिग्री आने से पहले ही पीले हो जाते हैं हाथ, 72 प्रतिशत बेटियों की 9 वीं से 12 वीं और 90 फीसदी की 12वीं के बाद छूट जाती है पढ़ाई
राजसमंद. हम भले ही बेटी और बेटे में सामान्य अधिकार की बात करते हों लेकिन कड़वा सच यह है कि आज भी हम इस खाई को पाट नहीं पाए हैं। सबसे बड़ा उदाहरण बेटियों की शिक्षा में देखने को मिलता है। शिक्षा विभाग के आकड़ों पर नजर डाले तो पता चलता है कि बराबरी के अधिकार की ढींगे मारने के बावजूद हम कितने पीछे हैं। आज भी ५वीं से ९वीं कक्षा में जाते-जाते ३६ फीसदी बेटियां शिक्षा की लौ से दूर हो जाती हैं। पांचवीं से नवीं तक ३६ प्रतिशत से अधिक बेटियों को घर बिठा दिया जाता है, जबकि ९वीं से १२वीं तक जाते-जाते यह प्रतिशत बढ़कर ७२ तक पहुंच जाता है। विशेषज्ञों की माने तो हायर एजूकेशन तक महज ५ से १० प्रतिशत बेटियां ही पहुंचती हैं।
मनमुताबिक विषय नहीं होना भी कारण
सरकार ने बेटियों के शिक्षा स्तर को बढ़ाने के लिए पंचायत स्तर पर १२वीं तक स्कूल की व्यवस्था कर दी है। इससे बेटी शिक्षा को बढ़ावा मिला है, लेकिन अभी भी सभी स्कूलों में साइंस और कॉमर्स विषय नहीं हैं। इससे अभी भी कई बेटियों की पढ़ाई बाधित हो रही है। मनमुताबिक विषय न मिलने से या तो वे अधूरे मन से पढ़ाई करती है या फिर पढ़ाई से नाता तोड़ लेती हैं।
यह हैं कारण
एसआरके कॉलेज में समाजशास्त्र की व्याख्याता डॉ. रचना तैलंग इसमें सबसे बड़ा कारण जागरूकता के अभाव को मानती है। उनका कहना है कि आज भी भारतीय समाज उतने खुले विचारों का नहीं हुआ है। लोग बेटियों को बाहर भेजकर पढ़ाना नहीं पसंद करते। अगर कोई घटना-दुर्घटना होती है तो उसका असर पूरे समाज में पड़ता है, जिससे कई मां-बाप बेटी को पढ़ाने की जगह उसकी शादी करना पसंद करते हैं। कुछ जगह आज भी बेटी और बेटों में अंतर माना जाता है। बेटियों की उच्च शिक्षा में विवाह भी बाधा बनता है, बाल विवाह को छोड़ भी दिया जाए तो भी बेटियों की शादी लगभग उनकी पढ़ाई की उम्र में ही हो जाती है। ऐसे में ५ से १० फीसदी बेटियां ही उच्च शिक्षा ग्रहण कर पाती हैं। हालांकि स्थितियों में सुधार हो रहा है, सरकार और संस्थाएं बेटियों की शिक्षा के लिए काफी हद तक प्रयास कर रही हैं।
अंतर समाप्त करने में जुटे हैं...
& स्कूलों में सरकार की विभिन्न योजनाएं चलाकर बेटियों का प्रतिशत बढ़ाने की लगातार कोशिश की जा रही है। पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर गौर करें तो देखने को मिलता है कि लगातार बेटियों की स्थिति सुधर रही है, इस वर्ष ही १२वीं में बड़ी संख्या में बेटियों के नामांकन किए गए हैं। जो पिछले वर्षों की तुलना में अधिक हैं। हम लगातार इस अंतर को समाप्त करने की कोशिश कर रहे हैं।
-शिवकुमार व्यास, अतिरिक्त जिला शिक्षाधिकारी, राजसमंद
Published on:
16 Jul 2018 02:00 pm
