
राजसमंद। पिपलांत्री... अब यह गांव नाम का मोहताज नहीं है। बेटी और कुदरत दोनों इस गांव के लोगों का अपना जज्बा और इज्जत है। इसके पीछे एक कहानी है, जो पिपलांत्री को देश-दुनिया के नक्शे पर लाने की वजह है। कहानी प्रेरणादायक है, इतनी कि दशरथ मांझी याद आ जाते हैं। मार्बल खदानों से घिरे इस गांव में कभी पानी, हरियाली का नामो-निशान मिट चुका था, आज देशभर की पंचायतें पिपलांत्री को अपने लिए आदर्श मानती हैं।
राजसमंद जिले में लगभग साढ़े छह हजार की आबादी की इस ग्राम पंचायत की कामयाबी की कहानी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गर्व के साथ सुनाई जाती है। गांव में एकता की मिसाल का यह आलम है कि आज इस गांव में हर हाथ को काम है और हर बेटी के लिए एक एफडी यानी फिक्स डिपोजिट। राजसमंद शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर बसा पिपलांत्री गांव देश ही नहीं दुनिया के लिए एक निर्मल ग्राम, स्वजल ग्राम, आदर्श ग्राम और अब पर्यटक ग्राम बन गया है। रालेगण सिदिृध के रचनाकार अन्ना हजार खुद यहां आकर इसकी तारीफ कर चुके हैं। इस गांव की अपनी तरह की योजनाएं हैं, जो कहीं और देखने को नहीं मिलेंगी।
समस्याओं का था अंबार
इस गांव की कामयाबी की कहानी शुरू होती है वर्ष 2005 से। उस साल पंचायती चुनाव में गांव के ही उर्जावाना व्यक्ति श्याम सुंदर पालीवाल गांव के सरपंच चुने गए। उस समय पानी की समस्या से जूझ रहे इस गांव में हर कदम पर समस्याएं मुंह फैलाएं खड़ीं थीं। बेरोजगार नौजवानों का भटकाव हो रहा था। ऊंची-नीची पहाड़ी पर बसे इस गांव में सिंचाई के साधन नहीं होने से खेत बंजर हो रहे थे। बच्चों की शिक्षा का कोई माकूल इंतजाम नहीं था।
श्याम सुंदर पालीवाल ने सबसे पहले गांव में पानी की समस्या को दूर करने की ठानी और गांव के ही बेरोजगार नौजवानों को लेकर बरसाती पानी को इक_ा करने के लिए लगभग एक दर्जन स्थानों पर एनीकट तैयार करवाए। गांव के नंगे पहाड़ों पर गांव वालों की मदद से पौधारोपण का काम शुरू करवाया और शिक्षा में सुधार के लिए स्कूल की इमारतों को दुरुस्त करवाया। महिलाओं का खास सहयोग मिला, जिन्होंने यहां बर्बादियों का आलम देखा। पूरा गांव जुटा तो देखते ही देखते तस्वीर बदलने लगी। बरसात का पानी एनिकटों में एकत्र होने लगा और कुछ वर्षों में जलस्तर ऊपर उठने लगा।
सूखे से जूझते गांव में पानी के झरने
आज ये हालात हैं कि जहां कभी जल स्तर 500 फुट की गहराई था, आज वहां पानी के सैकड़ों झरने फूट रहे हैं। श्याम सुंदर बताते हैं कि उन्होंने स्वच्छता को लेकर काम शुरू किया और खुद ही झाड़ू लेकर सफाई करनी शुरू की। उनकी देखादेखी गांव के अन्य लोग भी साफ-सफाई में आगे आने लगे और गांव में इतनी साफ-सफाई रहने लगी कि 2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति ने पिपलांत्री को स्वच्छ ग्राम पंचायत के पुरस्कार से सम्मानित किया.
लड़की के जन्म पर करा दी जाती है एफडी
पालीवाल ने गांव में एक और योजना शुरू की। यहां लड़की के जन्म पर लड़की के परिजनों द्वारा 51 पौधे लगाए जाते हैं, और वही परिवार उनकी देखरेख करता है। जब तक लड़की की ब्याह-शादी की उम्र होगी, पौधे पेड़ बनकर तैयार हो जाएंगे। इन पेड़ों से होने वाली आय से लड़की की शादी की जाएगी। जब किसी घर में किसी मृत्यु होती है तो उसकी स्मृति में भी पेड़ लगाने की यहां परंपरा है। पेड़ों को बचाने के लिए यहां हर साल रक्षाबंधन के त्योहार पर महिलाएं पेड़ों को राखी बांधती है। श्यामसुंदर अपने गांव की इस सफलता की कहानी को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सुना चुके हैं।
Published on:
07 Feb 2020 02:25 pm
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