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सपा के लिए आजम खान कितने हैं अहम? 2027 विधानसभा चुनाव से पहले ‘मुस्लिम वोट बैंक’ पर खतरा

समाजवादी पार्टी के लिए आजम खान लंबे समय से पश्चिमी यूपी में मजबूत स्तंभ रहे हैं। उनकी गैरमौजूदगी में 2027 चुनाव सपा के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

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क्या खत्म हो जाएगा आजम खान का ‘जादू’?

क्या खत्म हो जाएगा आजम खान का ‘जादू’?

UP Politics: समाजवादी पार्टी (सपा) के लिए आजम खान पिछले तीन दशकों से एक अहम स्तंभ रहे हैं। रामपुर सदर विधानसभा सीट से 10 बार विधायक रह चुके आजम खान ने मुस्लिम वोट बैंक को सपा से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यादव-मुस्लिम गठजोड़ की मजबूती का श्रेय उन्हीं को जाता है। 1980 से रामपुर पर कब्जा जमाने वाले खान ने 1993 से सपा टिकट पर लगातार जीत दर्ज की। 2012 में अखिलेश सरकार में आठ मंत्रालय संभालकर उन्होंने परिवार और क्षेत्र में अपनी ताकत दिखाई। 2022 के विधानसभा चुनाव में जेल से ही उन्होंने रामपुर सदर पर भारी मतों से जीत हासिल की, जबकि बेटे अब्दुल्लाह आजम ने स्वार सीट पर कब्जा जमाया। यह उनके कद का प्रमाण था।

सपा की जीत हमेशा उनके नाम

पुराने चुनावों में उनका प्रभाव स्पष्ट था। रामपुर सदर पर सपा की जीत हमेशा उनके नाम से जुड़ी रही। 2002 से 2022 तक हर बार भारी अंतर से जीत मिली। 2022 के बाईपोल में जब आजम अयोग्य ठहराए गए, तो भाजपा ने सीट छीन ली, यह पहला मौका था जब रामपुर सपा परिवार के बिना हार गई। इससे साफ हुआ कि आजम का व्यक्तिगत करिश्मा और मुस्लिम वोटों का एकीकरण सपा की क्षेत्रीय ताकत का आधार है। पश्चिमी यूपी की कई सीटों पर उनका प्रभाव पड़ोसी जिलों तक फैला हुआ है। लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव में स्थिति अलग है।

नवंबर 2025 में रामपुर कोर्ट ने पैन कार्ड फर्जीवाड़े के मामले में आजम खान और बेटे अब्दुल्लाह को 7 साल की सजा सुनाई। सितंबर 2025 में 23 महीने बाद जेल से रिहा होने के कुछ महीनों बाद ही यह सजा आई। अब अपील चल रही है, लेकिन 2027 तक आजम जेल में ही रहने की संभावना ज्यादा है। चुनाव लड़ने पर भी अयोग्यता लगभग तय है (कम से कम 2028 तक)।

बिना आजम के सपा का सफर कितना मुश्किल?

रामपुर सीट पर सपा का प्लान अब 'पोस्ट-आजम' दौर की तैयारी पर टिका है। मार्च 2026 में पार्टी ने रामपुर इकाई में लीडरशिप रिशफल की, सुरेंद्र सागर जैसे नए चेहरों को तरजीह दी जा रही है। परिवार के सदस्य (पत्नी तनजीन फातिमा या बेटे) पर भी भरोसा कम हो रहा है, क्योंकि वे भी सजा या अयोग्यता के दायरे में हैं। सपा अब सामाजिक आधार बढ़ाने और विकल्प नेतृत्व पर जोर दे रही है, लेकिन समर्थकों में नाराजगी है। वे इसे "बेवफाई" बता रहे हैं। बिना आजम के पश्चिमी यूपी में मुस्लिम वोटों का एकीकरण टूटने का खतरा है।

रामपुर-मुरादाबाद क्षेत्र में असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM, चंद्रशेखर आजाद की ASP या BSP जैसे विकल्प मजबूत हो सकते हैं। 2022 के बाईपोल और 2024 लोकसभा में रामपुर पर सपा की निर्भरता दिख चुकी है। अगर आजम का "फैक्टर" गायब रहा तो सपा को 10-15 सीटों का नुकसान हो सकता है, खासकर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में। अखिलेश यादव ने हाल में आजम से मुलाकात कर उन्हें "पार्टी का नींव" बताया और 2027 में सत्ता में आने पर फर्जी केस वापस लेने का वादा किया, लेकिन यह सिर्फ नैतिक समर्थन है।

2027 का सफर काफी चुनौतीपूर्ण

आजम खान सपा के लिए "मुस्लिम चेहरे" और पश्चिमी यूपी के वोट इंजन रहे हैं। उनके बिना 2027 का सफर काफी चुनौतीपूर्ण होगा। पार्टी को न केवल रामपुर पर नया प्लान नाना होगा, बल्कि पूरे क्षेत्र में मुस्लिम समर्थन बनाए रखना होगा। आजम का करिश्मा जेल से भी काम आया, लेकिन 2027 में उनकी गैरमौजूदगी सपा की रणनीति को पूरी तरह बदल देगी।