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कांटों की अद्भुद दुनिया, जिससे एक राजा को था प्यार

विदेशों से मंगवाए कांटों के पौधे कैक्टस, सजा दी कांटों की दुनिया, एशिया के सबसे बड़े कैक्टस गार्डन के रूप में मिली पहचान

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रतलाम । प्यार मोहब्बत की अनेक कहानियां आपने पढ़ी सुनी और देखी होंगी, जिसमें लड़की-लड़के, पति-पत्नी, बेटा-बेटी और भाई बहन के प्यार की कहानियां होंगी। कुछ ऐसी कहानी भी आपके जेहन में होगी जहां कुछ लोग प्रकृति से प्रेम करते होंगे तो कुछ पशु प्रेमी होंगे। यह कहानी कुछ अलग है। यह कहानी एक राजा के कांटों से प्यार की है। जिससें में सैलाना के राजा दिग्विजय सिंह कैक्टस के कांटों से मोहब्बत हो गई थी। वे कैक्टस के एसे दीवाने हुए कि कांटों की एक नई दुनिया ही बसा डाली। विदेशों से कांटों के पौधे मंगवाए, वहां की मिट्टी भी मंगवाई जिससे पौधे जीवित रह सके और तैयार करा दिया करीब1800 प्रजातियों का नया कैक्टस गार्डन। ये कैक्टस गार्डन पूरे एशिया का सबसे बड़ा कैक्टस गार्डन माना जाता है।

जर्मनी में मिली इसकी प्रेरणा
कांटों की ये दुनिया बसती है, रतलाम शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर सैलाना में, जिसे लोग कैक्टस गार्डन के नाम से जानते है। कांटों से भरे इस बगीचे में करीब 1800 प्रजाती के कैक्टस मौजूद है, जिसके चलते यह एशिया का सबसे बड़ा कैक्टस गार्डन कहलाता है। कैक्टस की यहां जितनी प्रजातियां हैं, उतनी शायद ही कहीं होगी। यहीं कारण है, कि आज भी एशिया में यह अपनी कांटों भरी चमक बिखेर रहा है। इसका निर्माण सैलाना महाराज दिगविजय सिंह ने कराया था। वह 1958 में जर्मनी की यात्रा पर गए थे और वहां उन्होंने कैक्टस देखें और उसके दीवाने हो गए। उसके बाद उन्होंने सैलाना में इसका बगीचा बनाने की ठानी और विदेशों से कैक्टस के पौधे बुलाकर एक ऐसा बगीचा तैयार कर लिया।

सेंव, साड़ी और सोने के बीच कांटों की दुनिया
सेंव, साड़ी, और सोने से पहचाने जाने वाले रतलाम की अपनी एक अलग पहचान इस कांटों की दुनिया से भी है। यह एक ऐसी दुनिया है, जिसके दीवानें हजारों लोग है। यदि कोई रतलाम आता है, तो वह कांटों से सजी इस दुनिया को देखे बगैर नहीं जाता है। कैक्टस की यहां जितनी प्रजातियां हैं, उतनी शायद ही कहीं होगी।

विदेशों से आए पौधे और मिट्टी
सैलाना के कैक्टस गार्डन में जर्मनी, टेक्सास, मैक्सिको, चिली सहित अन्य कई देशों से आए कैक्टस के पौधे लगे हंै। पौधे यहां जीवित रह सके इसके लिए विदेशों से पौधों के साथ मिट्टी भी मंगवाई गई थी। आम तौर पर लोग कांटों से बचते है, लेकिन यहां आने वाले लोग इनकी खूबसूरती को देख उन्हें छूने का प्रयास करते है। उस जमाने में बने इस बगीचे में फिल्म जीने नहीं दूंगा में धर्मेंद्र का एक गाना भी इस बगीचे में फिल्माया गया था। धर्मेंद्र जब शूटिंग के लिए गार्डन में पहुंचे थे, तो वह भी इसके दीवाने हो गए।

न्यू ईयर में उमड़ेंगे लोग
कैक्टस का जड़ीबूटी में भी उपयोग होता है लेकिन यह भी सच है कि इस पौधे में खिलने वाले फूल भी दुनिया के सबसे सुंदर फूलों में गिने जाते है। यहां पर वनस्पतिशास्त्र में शोध करने वाले भी बहुत से प्रोफेसर और छात्र आते हैं। सैलानियों के लिए भी यह स्पॉट बहुत अच्छा है। नए साल और क्रिसमस सेलिब्रेशन में बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचेंगे। हर साल टूरिस्टों के स्वागत के लिए यहां विशेष इंतजाम किया जाता है। यहां राजाओं के समय का महाकेदारेश्वर मंदिर है। इस मंदिर के पास ही बहुत सुंदर कुंड जो कि एक झरने के गिरने से बना है।

नए कैक्टस गार्डन की तैयारी
सैलाना एक और कैक्टस गार्डन बनाने की तैयारी चल रही है। इसके लिए पांच हेक्टेयर सरकारी जमीन चिन्हित भी की गई है। वन विभाग ने गार्डन विकसित करने के लिए बैंगलुरू के कुछ एक्सपर्ट की मदद ली है। देश में केवल सैलाना, गंगटोक और पंचकुला में ही कैक्टस गार्डन हैं। सैलाना में मौजूद गार्डन निजी है, इससे 2 किमी दूरी पर वन विभाग ने नया गार्डन बनाने की तैयारी की है। कैक्टस गार्डन बनाने के लिए वन विभाग ने 54 लाख की कार्ययोजना तैयार की है।