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जैन संत ने बताया क्या है सबसे बड़ा त्याग

रतलाम। वक्त का कोई भरोसा नहीं है, वह कब किस करवट बैठता है, इसका अंदाजा किसी को नहीं रहता, इसलिए अभिमान नहीं करना चाहिए। संसार में अहंकार धिक्कार है और विनम्रता संस्कार है। सम्यक ज्ञान की प्राप्ति विनम्रता ही कराती है, इसलिए सबका लक्ष्य अहंकारी नहीं विनम्र बनने का होना चाहिए। यह विचार शनिवार सुबह आचार्यश्री विजयराज महाराज ने छोटू भाई की बगीची में चातुर्मासिक प्रवचन में कही।

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महाराजश्री ने कहा कि मनुष्य को थोड़ा ज्ञान होने पर ही सर्वज्ञानी होने का अभिमान हो जाता है। जीवन में यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि दुर्योधन, कंस और रावण जैसे सर्व शक्ति शालियों का अभिमान भी नहीं रहा, तो हमारा कहां से रहेगा? महाराजश्री ने सन्मति के गुण सम्यक ज्ञान पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि महापुरुषों के अनुसार देने के लिए दान, लेने के लिए ज्ञान और त्यागने के लिए अभिमान होता है। दान केवल वस्तु का ही नहीं होता, अपितु अनुमोदना करके भी व्यक्ति महादानी बन सकता है। ज्ञान यदि विनम्र होकर प्राप्त किया जाता है, तो वह व्यक्ति को महान बना देता हैं। इसी प्रकार यदि अभिमान त्यागने के लिए है, ये किसी ने समझ लिया तो समझो कि उसे सम्यक ज्ञान का मर्म समझ में आ गया है।

सिद्धी तप का पारणा आज होगा

आचार्यश्री से महासती मोहकप्रभाश्री ने 23 उपवास, सुश्राविका सुनीता बोहरा ने 30 उपवास एवं सिद्धी तप कर रही रूपाली मेहता ने 8 उपवास के प्रत्याख्यान लिए। मेहता के सिद्धी तप का पारणा रविवार को होगा। आचार्यश्री ने तप आराधना की अनुमोदना करते हुए कहा कि संकल्प में बड़ी शक्ति होती है। अभ्युदय चातुर्मास के दौरान संकल्पबद्ध होकर कई आराधक तपस्याएं कर चुके है। शुरुआत में उपाध्यायश्री जितेश मुनि ने आचारण सूत्र का वाचन करते हुए तप, त्याग के क्षेत्र में आगे बढ़ने का आव्हान किया। इस दौरान सैकडों श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।