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केदारनाथ त्रासदी: आज भी है अपनों का इंतजार

केदारनाथ त्रासदी: आज भी है अपनों का इंतजार

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Kedarnath Tragedy

Kedarnath Tragedy: Even today, waiting for the people

रतलाम। केदारनाथ में त्रासदी हुए 16 जून को 5 वर्ष पूरे हो गए। आज भी रतलाम जिले में अनेक एेसे लोग हैं, जिनको अपनों का इंतजार इस भरोसे के साथ है कि कभी तो कोई खबर आएगी। कोई आएगा और सूचना देगा। या फिर अपने ही आकर दरवाजे पर खडे़ हो जाएंगे। वे एकटक अपनों के उन फोटो को देखते है, टकटकी लगाए दरवाजे पर इंतजार करते है। केदारनाथ त्रासदी ने अनेक एेसे परिवार रहे, जिनका सब कुछ ले लिया।

उत्तराखंड में भारी बारिश के कारण हाात बद से बदतर हो गए थे। जो लोग रतलाम से दर्शन को गए थे, उनके सामने भारी मुसीबतों ने दर्शन दे दिए थे। न कुछ खाने को न कुछ पीने को। कुछ खरीदना है तो अधिक दाम चुकाना पड़ा। न सिर्फ रतलाम, बल्कि रेंज के मंदसौर से लेकर नीमच तक अनेक लोगों के लापता होने की सूचना आई। हालात ये कि प्रशासन के इंतजाम फेल हुए तो हुए, सेना को भी मदद के इंतजाम को चलाने में परेशानी हुई। हरिद्वार से लेकर बद्रीविशाल तक जो लोग जहां थे, वही जम गए। अकेले रतलाम से 300 से कुछ अधिक लोग गए हुए थे।

खरीदा था 100 का एक पराठा तो 50 की चाय

परिवार सहित उत्तराखंड यात्रा पर गए अनेक लोगों ने बताया कि उस समय हालात खुब खराब थे। लोग खाने-पीने को तरस गए थे। दुकानदार इसका लाभ उठा रहे थे। 100 रुपए में एक पराठा तो 50 रुपए की कट चाय दे रहे थे। यहां तक की स्थानीय प्रशासन ने खाने के पैकेट बांटने की बात तो की, लेकिन दो दिन तक कुछ न मिल पाया। जहां नजर से देखों वहां सिर्फ पानी ही पानी था। जान बचाने के लिए महिलाओं ने अपने सुहाग की सबसे बड़ी निशानी मंगलसुत्र तक को गिरवी रखा। रोटी से लेकर पानी व दवाएं समाप्त हो गई थी।

दो माह का मासूम था साथ

रतलाम के दंतोडि़या के पंडित नरेंद्र शर्मा अपनी पत्नी आरती व दो माह के मासूम अनादि के साथ गए थे। 3 से 4 दिन तक को खाने को त्रासदी के दौरान कुछ नहीं मिला। एक सप्ताह तक तक तो जोशी मठ में रहे। जब रास्ता खुला तो वापसी की डगर मुश्किल थी। पंडित शर्मा ने बताया कि वाहन के आगे अचानक चट्टान गिर रही थी। जहां थे, वहां से श्रीनगर का रास्त सिर्फ पांच किमी था, लेकिन वहां तक पहुंचाना आसान नहीं था। चालक ने वाहन को पलटाया व कच्चे रास्ते से ऋषिकेश पहुंचे।

आज भी सहम जाते है याद करके

नीमच से यात्रा में गए बंशीलाल प्रजापति ने बताया था कि 16 जून को त्रासदी आने के बाद पेड़ पकड़ा था। 18 जून को होश आया। दो दिन बाद जब नीचे उतरे तो जहां देखें वहां शव ही शव थे। मौत से लड़कर नीमच लौटे बंशीलाल के अनुसार तीन दिन तक तो पीने को पानी ही नहीं मिला था। प्यासे रहे थे। परिवार मृत मान चुके थे। 23 जून को दोपहर तीन बजे सेना के जवान ने बेटे मदनलाल को सूचना दी कि बंशीलाल जिंदा है। यही के रेखा, रामकन्या के साथ दीपक व पवन को आज भी अपनी मां मंगलादेवी का इंतजार है। इन बच्चों के दादा राजाराम प्रजापति के अनुसार तो उनको ये भरोसा है कि बहु जिंदा है।

हर तरफ सिर्फ रहम की भीख

प्रकृति से लडऩे वाला मनुष्य इस त्रासदी के आगे हार गया था। हर कोई सिर्फ रहम की भीख मांग रहा था। रतलाम जिले के ताल के 10 लोग यात्रा पर गए थे। चार के बारे में आज तक सूचना नहीं पहुंची है। रतलाम से लेकर मंदसौर व नीमच में उस समय लोगों के कुशल होने के लिए दुआएं, पूजा, हवन आदि हुए। कोई धर्मस्थल एेसा न बचा था, जहां पर उपर वाले से ये भीख न मांगी गई हो के अब रहम करों।

200 फीट सड़क धंसी थी

नाहरपुरा निवासी गोवर्धन चौहान के अनुसार मठ के पास ही 200 फीट सड़क धंस गई। जहां सड़क धंसी वहां से बद्रविशाल व हरिद्वार के रास्ते निकलते है। जमीन धंसने से सारे रास्ते बंद हो गए थे। यहां तक की मोबाइल टॉवर गिर गए थे। एेसे में किसी से संपर्क नहीं हो पाया था। रतलाम की ही शारदा चौहान के अनुसार 60 से 70 परिवार इसी मठ में ठहरे हुए थे। गोपाल राठौड़ ने बताया कि उन्होने भी ट्रेन में जाने का आरक्षण करवाया था, लेकिन अंतिम समय में बारिश को देखते हुए निरस्त करवा दिया था।

नहीं भूलेंगी वो सात रातें

राणा चट्टी, मरकोट व टामटा में बिताई वो सात काली रातें कभी नहीं भूल सकते। हौसले पस्त हो गए थे। घर पहुंचेंगे कि नहीं इस बात की जानकारी नहीं थी। मोबाइल काम नहीं कर रहे थे। दहशत के उस मंजर में सिर्फ वाहन चालक एक एेसा व्यक्ति था, जिसने ये कहा था कि लाया हूं तो सुरक्षित भी ले भी जाउंगा। वो पूरे समय बोलता रहा कि साहब, पहाड़ों का मोसम और मुंबई की फैशन दोनों का भरोसा नहीं, जाने कब बदल जाए। बस यही बात बार-बार कहकर वो हिम्मत देता रहा। बद्रीविशाल में भागवत कथा करने रतलाम से 275 लोगों का जत्था गया था। बद्रीलाल के अनुसार 14 जून की सुबह हरिद्वार पहुंचे, 15 जून की सुबह 4 बस में 225 लोग व तीन जीप में 27 लोग चारधाम के लिए निकले। रात में राणा भट्टी पहुंचे तब तक तेज बारिश शुरू हो गई थी। 16 जून की सुबह यमनोत्री के लिए 6 हजार फीट ऊंचाई पर पहुंचे तो पता चला की पहाड़ों के साथ चट्टान भी बह गई है। अकेले यमनोत्री में 500 वाहन फंसे हुए थे।

विशेष विमान से लौटे थे सभी

उत्तराखंड त्रासदी के बाद कहीं जिंदगी बचाने की खुशी थी तो कहीं जिंदगी बचाने की जद्दोजहद। पहाड़ी प्रदेश में फंसे रतलाम सहित मध्यप्रदेश के तीर्थयात्रियों को वापस लाने में राज्य सरकार ने विशेष विमान लगाए। इसकी पहली खेंप से रतलाम के 38, भोपाल के 161, इंदौर के 150, जबलपुर के 73, हरदा के 3, सीहोर के 22, सागर के 12, शाजापुर के 7, खरगोन के 2, उज्जैन के 2, दतिया के 1 यात्री को लाया गया।

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