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पेज चार की बाटम – शहरों में स्लम समस्या विकट, चुनौती रोकने के लिए आवास योजना अहम

रतलाम

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Newsdesk

Aug 26, 2026

datia news

datia news (भाई ने की भाई की हत्या Photo Source- Patrika)

फोटो-आरटी-2603-डॉ लोकेंद्र सिंह कोट



रतलाम। भारत के शहर तेजी से बदल रहे हैं। कहीं मेट्रो दौड़ रही है, कहीं गगनचुंबी इमारतें और फ्लाईओवर बन रहे हैं, तो कहीं विशाल मॉल शहरी समृद्धि की तस्वीर पेश कर रहे हैं। लेकिन इसी तस्वीर के दूसरे छोर पर टीन, प्लास्टिक और अधपकी ईंटों से बने घर भी हैं। एक ओर करोड़ों रुपए के फ्लैट हैं, दूसरी ओर कुछ वर्गमीटर में पूरा परिवार। यही भारत के शहरी विकास का सबसे बड़ा विरोधाभास है।





छह करोड़ से अधिक लोगों का सवाल

भारत में स्लम की वर्तमान आबादी के लिए नई पूर्ण जनगणना उपलब्ध नहीं है। इसलिए 2011 की जनगणना ही अंतिम व्यापक आधिकारिक आधार है, जिसमें करीब 6.5 करोड़ लोग स्लम बस्तियों में रहते पाए गए थे। यह आज की आबादी नहीं, बल्कि समस्या के आकार को समझने वाली आधाररेखा है।







मजदूर को घर नहीं
शहर को राजमिस्त्री, घरेलू सहायिका, सुरक्षा गार्ड, ड्राइवर, सफाईकर्मी, डिलीवरी कर्मचारी और छोटे कारीगर चाहिए, लेकिन उनकी आय के अनुरूप आवास अक्सर उपलब्ध नहीं होते। गरीब व्यक्ति स्लम में इसलिए नहीं रहता कि उसे वहां रहना पसंद है, बल्कि इसलिए कि उसका रोजगार शहर में है और वैध किफायती आवास उसकी पहुंच से बाहर है। इसलिए स्लम केवल गरीबी नहीं, बल्कि आवास और शहरी नियोजन की समस्या भी है।







केवल मकान नहीं, अवसर चाहिए

स्लम-मुक्त शहर तभी संभव है जब परिवारों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति भी सुधरे। बच्चों की शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण, स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छ पानी और सीवरेज पर समान ध्यान जरूरी है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार के अवसर अगली पीढ़ी को गरीबी के चक्र से बाहर निकाल सकते हैं। हर शहर को अब स्लम प्रिवेंशन प्लान बनाना चाहिए। भविष्य में कितने श्रमिक आएंगे, कितने किफायती और किराये के घर चाहिए होंगे और सार्वजनिक परिवहन कहाँ तक पहुंचना चाहिए। इन सवालों के जवाब मास्टर प्लान में पहले से होने चाहिए।


गरीब नहीं, गरीबी को हटाना होगा
भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की आकांक्षा रखता है। उस भारत की परीक्षा उसकी सबसे ऊंची इमारत से नहीं, बल्कि उसकी सबसे गरीब बस्ती में रहने वाले बच्चे के भविष्य से होगी। स्लम शहर का दाग नहीं, बल्कि विकास मॉडल का आईना है। इसलिए लक्ष्य गरीबों को हटाना नहीं, गरीबी को हटाना होना चाहिए। स्थायी समाधान बुलडोजर नहीं, बल्कि सम्मानजनक आवास, शिक्षा, रोजगार और अवसर हैं।