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अंचल आकर्षण: हाट बाजार की रोनक गायब

रतलाम। अंचल के हाट बाजार अब सिमटते जा रहे हैं, ग्राहकों का सप्ताह का इंतजार और व्यापारियों की हाट बाजार की तैयारी अब केवल औपचारिकता मात्र रह गई है। आदिवासी अंचलों के बाजारों के मुख्य आकर्षण हाट बाज़ार अब धीरे-धीरे खत्म होने लगे हैं। पहले साप्ताहिक लगने वाले हाट बाजारों में आसपास के इलाकों से ग्रामीण किराना, कपड़ा, बर्तन आदि वस्तुओं की खरीदी करने के लिए प्रमुख रूप से आते थे, जिसके लिए व्यापारी भी दुकानों पर तैयारी करते थे।

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स्थानीय व्यापारियों के अलावा दूसरे स्थानों से भी लोग अलग-अलग वस्तुएं हाट बाजारों में बेचने के लिए आते थे, लेकिन अब उन छोटे-छोटे व्यापारियों ने भी आना बंद कर दिया हैं। सैलाना में रविवार और गुरुवार का दिन हाट का दिन होता हैं, इसमें रविवार को पशु हाट भी लगता हैं। पशु हाट में अभी भी ग्रामीण पशुओं की खरीद फरोख्त के लिए आते हैं, लेकिन बाज़ार की ग्राहकी काफी हद तक खत्म हो चुकी हैं।

ये हैं मुख्य वजह

हाट बाजारों के खत्म होने की मुख्य वजह हैं कि अब लोगों के पास मोटर साइकिल और ऑटो की सुविधा होने से वे हाट के दिन की राह नहीं देखते, जब भी किसी वस्तु की ज़रूरत होती हैं, ग्रामीण फौरन बाज़ार पहुंच जाते हैं।

हाट की रौनक अलग होती थी

व्यापारियों का कहना हैं कि ग्रामीण भले ही कभी भी खरीददारी करने के लिए आ जाते हो, लेकिन हाट की रौनक अलग रहती थी, हमें हाट के दिन का इंतज़ार रहता था क्योंकि उस दिन सामान्य दिनों की तुलना में अधिक व्यापार होता था।

अब परम्परा खत्म हो रही

हाट बाज़ार हमारे आदिवासी अंचल की सभ्यता का एक हिस्सा हैं, लेकिन समय के साथ यह परम्परा अब खत्म हो रही हैं, व्यापारियों के साथ साथ ग्रामीणों के लिए भी हाट बाज़ार फ़ायदे का सौदा होता था, छोटी बड़ी सभी चीजें आसानी से उपलब्ध हो जाती थी।
- जयंत मांडोत, किराना व्यापारी

अब पहले जैसी बात नहीं

हाट खत्म हो चुके हैं, अब पहले जैसा व्यापार नहीं होता हैं, बर्तनों के व्यापार में काफी गिरावट आई हैं
- नितेश भरावा, बर्तन व्यापारी

पड़ रहा विपरीत प्रभाव

कपड़ों के ऑनलाइन व्यापार ने पहले से ही व्यापार पर विपरीत असर डाला था। अब हाट खत्म होने से व्यापार में और अधिक विपरीत प्रभाव पड़ रहा हैं।
दिनेश कुमावत, कपड़ा व्यापारी