
SDM dances on the beat of drum in Bhagoria festival, watch video
रतलाम. मध्यप्रदेश के रतलाम संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले झाबुआ, अलीराजपुर में इन दिनों भगोरिया पर्व चल रहा है। इस दौरान मध्यप्रदेश में पदस्थ एक महिल एसडीएम ने ढ़ोल की थाप व बांसुरी की तान पर जो नृत्य किया उसका वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। एसडीएम रतलाम संसदीय क्षेत्र के अलीराजपुर में पदस्थ है।
एसडीएम ने बासुंरी की तान पर आदिवासी लोकपरंपरा अनुसार जो नृत्य किया, उसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। एसडीएम लक्ष्मी गामड़ ने यह नृत्य सामूहिक रुप से किया है। बता दे कि होली के पूर्व आदिवासी अंचल में भगोरिया पर्व उत्साह से मनाया जाता है। इसमे मेला लगता है व बड़ी संख्या में आदिवासी समाज शामिल होता है। एसडीएम लक्ष्मी गामड़ अलीराजपुर तबादला होने के पूर्व रतलाम में पदस्थ रही है व एक कड़क अधिकारी के रुप में इनकी छवि रही है। रतलाम में कोरोना काल में इनके द्वारा किए गए कार्यो को अब भी शहर के लोग याद करते है।
यह होता है भगोरिया
मध्य प्रदेश के पश्चिम क्षेत्र में आदिवासियों के उल्लास और उमंग के पर्व भगोरिया का आगाज 11 मार्च से हो गया है। एक सप्ताह तक चलने वाला यह भगोरिया होलिका दहन के साथ 17 मार्च को खत्म होगा। भगोरिया दरअसल एक हाट बाजार होता है। जो होली के सात दिन पहले से लगता है। अलग-अलग इलाकों में लगने वाले बाजार में आदिवासी पारंपरिक अंदाज में सज-धजकर आते हैं। आदिवासियों के लिए ये किसी त्योहार जैसा ही होता है। इंदौर संभाग के 5 आदिवासी बहुल जिलों के 176 गांव व कस्बों में भगोरिया हाट की धूम रहेगी। धार जिले में 59 स्थानों पर, झाबुआ जिले में 36 स्थानों पर, अलीराजपुर जिले में 24 स्थानों पर, बड़वानी जिले में 45 स्थानों पर व खरगोन जिले में 12 स्थानों पर आदिवासियों के लोकप्रिय सांस्कृतिक पर्व भगोरिया का आयोजन शुरू हो गया है।
भगोरिया हाट कहा जाता
होली के पहले हफ्ते में पड़ने वाले साप्ताहिक बाजार को ही भगोरिया हाट कहा जाता है। जब पूरा आदिवासी समाज फसलें काटकर खेती-बाड़ी के कामों से निवृत्त हो जाता है। इसके बाद वो अपनी पारंपरिक वेशभूषा में सज-धज कर उत्साह के साथ पूरे परिवार, दोस्तों के साथ इन हाट में जाते हैं। इस दौरान ढोल-मांदल गूंजते हैं। आदिवासी पारंपरिक लोकनृत्य करते हैं। सातों दिन अलग-अलग जगह इसका आयोजन होता है। आदिवासी बड़ी संख्या में वहां पहुंचते हैं। मेले जैसा नजारा हो जाता है। आदिवासियों की परंपरा के बीच अलग ही उत्साह नजर आता है। अब तो आसपास के शहरों से भी लोग यहां पहुंचने लगे हैं।
Published on:
16 Mar 2022 09:24 am
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