
15 अप्रेल 1658 को धरमत फतेहाबाद चंद्रावती गंज में लगा गया युद्ध जिसमें बलिदान हुए महाराजा रतनसिंह सहित कई राजपूत वीर
रतलाम. मध्यकालीन भारतीय इतिहास वीरता, संघर्ष और बलिदान की अनुपम गाथाओं से परिपूर्ण है। इन्ही में एक महत्वपूर्ण युद्ध रतलाम महाराजा रतनसिंह राठौड़़ ने धरमत (फतेहाबाद/चंद्रावतीगंज) का युद्ध जो 15 अप्रेल 1658 को लड़ा गया था। यह युद्ध केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि मुगल साम्राज्य के उत्तराधिकारी को लेकर उत्पन्न आंतरिक संघर्ष का परिणाम था, जिसने भारतीय इतिहास की दिशा को निर्णायक रूप में प्रभावित किया।
इतिहासकार नरेंद्रसिंह पंवार के अनुसार इतिहास प्राय: विजेताओं के दृष्टिकोण से लिखा जाता हैं, इसी कारण धमरत के इस युद्ध को वह स्थान नहीं मिल पाया, जिसका यह वास्तविक अधिकारी था। फिर भी लोक परम्पराओं, चारण काव्य और एतिहासिक संदर्भों में यह युद्ध आज भी जींवत हैं।
युद्ध का असर राजस्थान और मालवा क्षेत्र पर पड़ा
यह युद्ध मुगल उत्तराधिकार के संघर्ष का एक महत्वपूर्ण चरण था। एक ओर शाही सेना थी, जिसका नेतृत्व जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह कर रहे थे। वहीं दूसरी ओर औरंगजेब और मुराद की संयुक्त सेना थी। यद्यपि यह संघर्ष मुगल सत्ता के भीतर का था, किन्तु इसका प्रभाव सम्पूर्ण भारत, विशेषकर राजस्थान और मालवा क्षेत्र पर पड़ा।
जब महाराजा जसवंतसिंह को हटाने का किया निर्णय
जब युद्ध की परिस्थितियां अत्यंत विषम हो गई, तब राजपूत सरदारों ने महाराजा जसवंतसिंह की सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हुए उन्हे युद्ध भूमि से हटाने का निर्णय लिया। इस एतिहासिक क्षण का सुंदर चित्रण कवि कुम्भकर्ण ने अपने काव्य में किया।
हठ न करह महाराज, अब ममदिया अरंग पाट।
गिरा मेघ गंभीरवत, नभवाणी वैराट।।
छत्र धरह सुजाण को, रतनसिंह सिर अत्र।
छत्र धरन हिन्दुवान को, नृपति धीरज धर।।
इसका आशय है कि महाराज जसवंतसिंह से आग्रह किया गया कि वे हठ न करें और युद्ध का सम्पूर्ण दायित्व वीर रतनसिंह को सौंप दें। आप राठौड़ वंश के गौरव हैं, अत: आपकी रक्षा आवश्यक हैं। यह वर्णन एक प्रकार की दैवी प्रेरणा जैसा प्रतीत होता हैं।
महाराजा रतनसिंह ने दिया अदम्य साहस-शौर्य का परिचय
पंवार ने बताया कि इस निर्णायक मोड़ पर युद्ध का सम्पूर्ण नेतृत्व रतलाम के महाराजा रतनसिंह को सौंपा गया। यही वह क्षण था जब रतलाम ने केवल एक रियासत नहीं, बल्कि पूरे राजपूत स्वाभिमान और परम्परा का भार अपने कंधों पर उठा लिया। महाराजा रतनसिंह ने विपरीत परिस्थितियों में भी अदम्य साहस और शौर्य का परिचय दिया। उनके नेतृत्व में राठौड़, चौहान, भाटी, झाला, गोहिल सहित अनेक राजपूत वंशों के वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी।
आज मनेगा महाराजा रतनसिंह का बलिदान दिवस
धरमत चद्रावतीगंज के मैदान में युद्ध 15 अप्रेल 1658 ई के वीर रणबाकुरों को समर्पित महाराजा रतनसिंह बलिदान दिवस समारोह बुधवार को मनाया जाएगा। पूर्व संध्या पर नगर निगम तिराहा स्थि महाराजा प्रतिमा स्थल पर आकर्षक विद्युत सज्जा से जगमगा रहा था। महाराजा रतनसिंह बलिदान दिवस आयोजन समिति अध्यक्ष रत्नदीपसिंह सरवन, संरक्षक धीरेंद्रसिंह सरवन ने बताया कि बुधवार की शाम 6 बजे मुख्य अतिथि महपौर प्रहलाद पटेल, विशेष अतिथि भाजपा जिलाध्यक्ष प्रदीप उपाध्याय, शहर कांग्रेस अध्यक्ष शांतिलाल वर्मा और केकेसिंह कालूखेड़ा की अध्यक्षता में कार्यक्रम नगर निगम तिराहे पर आयोजित होगा। इसके पूर्व अलकापुरी चौराहे से वाहन रैली प्रमुख मार्गो से होते हुए आयोजन स्थल पहुंचेगी।
Updated on:
14 Apr 2026 10:59 pm
Published on:
14 Apr 2026 10:58 pm
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