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यह विश्व प्रसिद्ध तीर्थ नगरी विकास को तरसती

रतलाम/आलोट। सुप्रसिद्ध तीर्थ श्रीअनादिकल्पेश्वर महादेव की नगरी...विश्व विख्यात जैन तीर्थ नागेश्वर उन्हेल के लिए पहचाना जाने वाला आलोट नगर देश-विदेश तक के हजारों तीर्थ यात्रियों का आस्था स्थल है। लेकिन नगरी तीस हजार से अधिक की आबादी वाला आलोट नगर विकास के मामले में आज भी पिछड़ा हुआ है। दिल्ली-मुंबई मुख्य रेलमार्ग से जुड़े होने एवं प्रचुर मात्रा में नदियों का पर्याप्त जल भंडार होने के बावजूद राजनैतिक इच्छा शक्ति के अभाव में यह नगर उद्योग धंधों से सर्वथा वंचित रहा है।

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Hindi News Ratlam

गन्ना-कपास हुआ करती थी कभी पहचान

यह क्षेत्र मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है, उपजाऊ काली मिट्टी वाले इस क्षेत्र में गेहूं, चना, सोयाबीन, मक्का सहित दोनों सीजन की कई फसलें प्रचुर मात्रा में होती है। फसलों के कम-ज्यादा उत्पादन के अनुसार यहां का व्यापार व्यवसाय संचालित होता है। यद्यपि चार-पांच दशकों पूर्व इस क्षेत्र में कपास और गन्ने की फसलें प्रचुर मात्रा में होती थी, जिसके कारण आलोट में कई जिनिंग फैक्टरियां संचालित होती थी और अधिक गन्ना उत्पादन को देखते हुए यहां एक शुगरमिल के स्थापना की योजना वर्ष 1947 के आसपास बनी थी, जिसकी मशीनरी लाहौर से आने वाली थी, किन्तु उसी समय भारत-पाक बंटवारा हो जाने के कारण मशीनें न आ पाई और यहां की गई सारी तैयारीयां धरी की धरी रह गई । यहां तक की क्षेत्र के किसानों को गन्ना उत्पादन के लिए मिल प्रबंधन व्दारा दी गई सैकड़ों एकड़ जमीनें किसानों के पास ही रह गई। और अब सत्तर वर्ष से अधिक बीत जाने के बाद भी इन कृषकों के पास कब्जा तो है पर न तो मालिकाना हक है न वे खेती के लिए शासन की किसी योजना का लाभ उठा पाते है। यह मुद्दा आज भी जस का तस है और गाहे-बगाहे विधानसभा में भी मुद्दा उठता रहा है।

उद्योग धंधों के लिए तरस रहा

इसके साथ ही सोयाबीन की फसल जब प्रचलन में आई तो उसका रकबा निरंतर बढ़ता ही गया और उसी अनुपात में कपास की फसल का रकबा घटता गया। यहां तक कि कपास उत्पादन के अभाव में नगर की जिनिंग फैक्टरियां एक, एक कर बंद हो गई और उद्योग के नाम पर आलोट पूरी तरह वंचित हो गया। विडंबना यह है कि कई दशक बीत जाने के बाद भी आलोट नगर न केवल उद्योग धंधों के लिए तरस रहा है, बल्कि विकास की उम्मीद लिए आज भी जनप्रतिनिधियों की ओर आशा भरी नजरों से देख रहा है।

आल्हा से हो गया आलोट

जनश्रुति के अनुसार वर्तमान में जिस जगह आलोट नगर बसा है वहां पहले घना जंगल था और उस जंगल में आल्हा नाम का लूटेरा रहा करता था जो जंगल से गुजरने वाले राहगीरों को लूट लिया करता था। आल्हा की यह लूट काफी चर्चित हो गई थी और दूर-दूर तक के लोग इसके बारे में जानने लगे थे। कालांतर में जंगल का घनत्व कम होता गया और धीरे-धीरे आल्हा की लूट वाले स्थान पर मानव बस्तीयां बस गई और आल्हा लूट के नाम से जाना जाने वाले इस स्थान का नाम आलोट हो गया। जो आजादी के पूर्व तक देवास स्टेट के अंतर्गत आता था और देवास महाराज के नगर आगमन पर उनके ठहरने के लिए गढ़ी बनाई गई थी, जिसमें आजादी के बाद में लंबे समय तक तहसील कार्यालय चला था। नगर में देवास स्टेट की कई संपत्तियां आज भी यहां मौजूद है।