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Video यहां पढे़: दशामाता पूजा, मुहूर्त, समय 2018 एवं व्रत कथा, जानिए पूजा के लिए शुभ समय

खबर में वीडियों से जाने 12 मार्च को कब है पूजन का समय

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Dasha Mata 2018

Dasha Mata Vrat

रतलाम। उत्तर भारत में दशामाता की पूजा व व्रत का त्योहार उत्सव की तरह मनाया जाता है। इस दिन सुहागन महिलाएं पति की लंबी आयू के साथ-साथ परिवार की रक्षा व धन सदा बना रहे व माता लक्ष्मी की अनंतकोटी कृपा रहे इस कामना के साथ पूजन करती है। मनुष्य के दिन हमेशा एक से रहे इसलिए दशामाता की पूजन की जाती है। इस बार 12 मार्च को ये पर्व मनाया जाएगा।

ये बात रतलाम राज परिवार के ज्योतिषी व वरिष्ठ पंडित अभिषेक जोशी ने शुक्रवार को सुहागन महिलाओं का प्रमुख व्रत व परिवार में दशामाता के महत्व विषय पर भक्तों को कही। इस दौरान पंडित जोशी ने बताया कि जब समय श्रेष्ठ रहता है, तब सभी प्रकार के कार्य सिद्ध होते हैं, लेकिन समय की अनुकूलता समाप्त होते ही बनते काम भी बिगडऩा शुरू हो जाते है। एेसे में ये जरूरी है की प्रत्येक भारतीय १२ मार्च को दशामाता की पूजन परंपरा अनुसार करें।

ये है दशा माता की पूजन विधि


राज परिवार के ज्योतिषी व वरिष्ठ पंडित जोशी ने बताया की चैत्र महीने की कृष्णपक्ष की दशमी पर महिलाएं दशामाता का व्रत करती हैं। यह व्रत विशेषकर घर की दशा ठीक रहे इसलिए किया जाता है। सबसे घर के मंदिर में दीवार पर स्वास्तिक बनाये व मेहंदी अथवा सिंदूर से वही दस बिंदिया अंगुली से बना दें। पूजा सामग्री में भावना अनुसार रोली, मौली, सुपारी, चावल, दीप, नैवेद्य, धुप, अगरबत्ती लें। इसके साथ में सफेद सुत का धागा लें और उसमे गांठ लगा लें। धागे को हल्दी के रंग में रंग लें। इस धागे को दशा माता की बेल कहते है। इसकी पूजा के साथ में ही करके इसे गले में धारण करें। इसे फिर पुरे साल कभी न उतारे। अगले वर्ष जब पुन: पूजा करें तो इसे उतारकर नए धागे की पूजा करके धारण करें। नियमानुसार दशा माता की पूजा व अर्चना करने से दशा माता की कृपा प्राप्त होती है। घर में सुख शांति व समृद्धि पूरे वर्ष आती है। इसमे धागा पहनने के बाद पीपल के पेड़ की दस बार परिक्रमा करना जरूरी है।

ये है व्रत की कहानी, बगैर सुने अधूरा है व्रत का फल

बहुत समय पहले की बात है एक राजा था। राजा की दो रानिया थी। बड़ी रानी के एक भी संतान नहीं थी, जबकि छोटी रानी के एक पुत्र था। इस वजह से राजा छोटी रानी और राजकुमार को बहुत प्यार करता था। इसके चलते बड़ी रानी मन में ईष्र्या पालने लगी। जलन की भावना इतनी बढ़ गई की बड़ी रानी ने राजकुमार के प्राण हरने की योजना बनाई। एक दिन राजकुमार खेलते-खेलते जब बड़ी रानी के क्षेत्र में चला गया तो बड़ी रानी ने जलन के मारे छोटी रानी के बेटे व राजकुमार के गले में सांप डाल दिया। कहते है मारने वाले से बड़ा बचाने वाला होता है। बड़ी रानी को छोटी रानी की ये बात नहीं पता थी की वह दशामाता का व्रत, पूजन आदि करती है।

इन तरीकों से भी नहीं गई जान

सांप बगैर कोई नुकसान पहुंचाए राजकुमार के गले से निकलकर चला गया। इसके बाद बड़ी रानी ने अपने व्यवहार को बदला। हर कोई को लगा बड़ी रानी सुधर गई है, लेकिन ये बड़ी रानी की चाल थी। बड़ी रानी ने लड्डू में जहर मिलाकर राजकुमार को खिलाएं, लेकिन फिर एक बार ये बात सिद्ध हो गई की मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है। रातकुमार ने जैसे ही लड्डू खाने के लिए मुंह खोला दशामाता एक दासी का रुप बनाकर आई व राजकुमार के सभी लड्डू छीन लिए। एेसे में बड़ी रानी परेशान हो गई। इसके बाद जब राजकुमार बगीचे में खेलने गया तो बड़ी रानी ने राजकुमार को कुएं मे धकेल दिया। लेकिन एक बार फिर ये सिद्ध हुआ की मारने वले से बचाने वाला बड़ा होता है। यहां भी दशामाता ने राजकुमार को बचा लिया।

छोटी रानी को दिए मां ने दर्शन

दोपहर होने तक जब राजकुमार नहीं आए तो छोटी रानी को चिंता होने लगी। राजा व रानी अपने राजकुमार की याद में रोने लगे। इस बीच नगर में सभी को सूचना दी गई की जो राजकुमार को तलाशकर लाएगा उसको पुरस्कार दिया जाएगा। इस बीच मां भिखारी के रुप में राजा के दरबार में पहुंची। भिखारी के पास राजकुमार को देखकर छोटी रानी को गुस्सा आ गया। छोटी रानी ने गुस्से में सवाल किया की तुमने एेसा क्यों किया। मेरे सवाल का जवाब दो, न तो कारागार में डाल दिया जाएगा।

में तुम्हारी आराध्य देवी हूूं

इस पर मां ने छोटी रानी को दर्शन देते हुए कहा की में भिखारी नहीं हूं। में तुम्हारी आराध्य देवी दशामाता हूं। मां ने राजा को बताया कि किस तरह से बड़ी रानी ने अनेक उपाय किए व राजकुमार को मारने का प्रयास किया। इस पर छोटी रानी ने मां के पैर पकड़ लिए, कहा जिस तरह की कृपा आपने की है, में चाहती हूं आप सदा के लिए महल में निवास करें। इस पर मां ने कहा वे महलों में नहीं रहती। जो जिस भाव से पूजन करता है, में उस पर कृपा करती हूं। मेने तुम्हे दर्शन दिए है, इसलिए तुम सुहागन महिलाओं को बुलवाओं। उनको भोजन कराकर शहर को बता दो की जो चैत्र माह की कृष्णपक्ष की दशमी को मेरी पूजन करेगा, धागा गले में धारण करेगा, पीपल के पेड़ की दस बार परिक्रमा करेगा, उसके व उसके परिवार के उपर पूरे वर्ष के लिए मेरी कृपा रहेगी। मेरी कृपा के बाद उस परिवार में बीमारी नहीं आएगी व धन की कमी पूरे वर्ष नहीं रहेगी।

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