
relationship
अगर छोटी-छोटी बातों से रिश्तों में कड़वाहट आने लगे, किंतु आपको अपने पार्टनर से प्यार भी बहुत है, तो जितनी जल्दी हो सके कड़वाहट को दूर कर लें। एक अध्ययन में सामने आया है कि इसके लिए आप भविष्य के बारे में सोच सकते हैं, इससे उलझनों से उबरने में मदद मिलेगी। वाटरलू यूनिवर्सिटी की ओर से करवाए गए अध्ययन के लेखक एलेक्स हुएन्ह ने लिखा है कि जब आपका पार्टनर पैसे, जलन या आपसी मुद्दों पर बहस करता है, तो वह उस वक्त अपनी भावनाओं का इस्तेमाल बहस को तीखा करने के लिए करता है। ऐसे में जब वह अपने रिश्ते को लेकर भविष्य के बारे में सोचना शुरू करता है, तो उनका ध्यान झगड़े से हट जाता है। यह अध्ययन ‘सोशल साइकोलॉजिकल एंड पर्सनैलिटी साइंस’ में प्रकाशित हुआ है। अतीत के शोध के मुताबिक, लोग बेवफाई के मुद्दों पर अधिक बेहतर तरीके से सोचने में सक्षम होते हैं, जब उनसे तीसरे व्यक्ति के रूप में सोचने के लिए कहा जाता है। शोध के मुताबिक, भविष्य के बारे में सोचना रोजाना के जीवन में सामने आने वाले विभिन्न प्रकार के संघर्षो से निपटने में लाभदायक साबित हो सकता है।
मैंने माता-पिता से आखिर क्या सीखा?
अपने नौ बच्चों के लालन-पालन में कभी भी मां ने अपेक्षाएं नहीं की। जो घर में उपलब्ध था उसी से सभी को पाला। मां ने हम पर कभी हाथ उठाया हो, याद नहीं पड़ता। हमने मां से यही सीखा कि अपेक्षाएं ज्यादा मत पालो और कभी भी बच्चों पर हाथ मत उठाओ। ऐसे ही विचार अपने ब्लॉग पर प्रस्तुत किए हैं अजित गुप्ता ने...
प्रथम गुरु मां होती है। मैंने मां से क्या सीखा? मां के बाद पिता गुरु होते हैं। मैंने पिता से क्या सीखा? देखें आज आकलन करके। मेरे पिता दृढ़ निश्चयी थे, उन्हें मोह-ममता छूते नहीं थे। हर कीमत पर अपनी बात मनवाना उनकी आदत में शुमार था। घर में उनका एकछत्र राज था। मां उनके स्वभाव को सहजता से लेती थी। लेकिन घर में क्लेश ना हो इस बात से डरती भी थी।
घर में पिता के कारण कैसा भी तूफान आ जाए लेकिन हमने अपनी मां के आंखों में कभी आंसू नहीं देखे। ना वे हमारे सामने कभी रोईं और ना ही अपनी हमजोलियों के सामने। जैसी परिस्थिति थी उसे वैसा ही स्वीकार कर लिया। हमने अपनी मां से यही सीखा कि कैसी भी परिस्थिति हो आंसू बहाकर कमजोर मत बनो।
अपने नौ बच्चों के लालन-पालन में कभी भी मां ने अपेक्षाएं नहीं की। जो घर में उपलब्ध था उसी से सभी को पाला। मां ने हम पर कभी हाथ उठाया हो, याद नहीं पड़ता। हमने मां से यही सीखा कि अपेक्षाएं ज्यादा मत पालो और कभी भी बच्चों पर हाथ मत उठाओ। पिताजी घर की बागडोर अपने हाथ में रखना चाहते थे इसलिए मां के हाथ में चार पैसे भी उन्हें मंजूर नहीं थे। हमने मां से यही सीखा कि पैसे का मोह मत करो। यदि पिता अपने हाथ में रखना चाहते हैं तो ठीक है, उन्हें दे दो बस शांति रखो।
Published on:
22 Sept 2017 02:02 pm
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