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रिश्तों में तनाव बच्चे को बना सकता है बीमार

अध्ययनों के अनुसार, भारत में लगभग 1.6 प्रतिशत से 12.2 प्रतिशत तक बच्चों में एडीएचडी यानी अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर की समस्या है

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Amanpreet Kaur

Sep 23, 2017

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अध्ययनों के अनुसार, भारत में लगभग 1.6 प्रतिशत से 12.2 प्रतिशत तक बच्चों में एडीएचडी यानी अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर की समस्या है। ध्यान की कमी और अत्यधिक सक्रियता की बीमारी को एडीएचडी कहा जाता है। ये ऐसे परिवारों में अधिक बिगड़ सकती है जहां घर में तनाव रहता है...

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के मुताबिक हाइपरएक्टिविटी की समस्या ज्यादातर प्री-स्कूल या केजी कक्षाओं के बच्चों में होती है। कुछ बच्चों में, किशोरावस्था की शुरुआत में स्थिति खराब हो सकती है। आईएमए के अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल के अनुसार- ‘एडीएचडी वाले बच्चे बेहद सक्रिय और कुछ अन्य व्यवहारगत समस्याएं प्रदर्शित कर सकते हैं। उनकी देखभाल करना और उन्हें कुछ सिखाना मुश्किल हो जाता है। वे स्कूल में भी जल्दी फिट नहीं हो पाते हैं और कोई न कोई शरारत करते रहते हैं। यदि इस कंडीशन को शुरू में ही काबू न किया जाए तो यह जीवन में बाद में समस्याएं पैदा कर सकती हैं।’

तीन तरह के लक्षण

इस डिसऑर्डर के लक्षणों को तीन श्रेणियों में बांटा जाता है : ध्यान न देना, जरूरत से अधिक सक्रियता और असंतोष। चीनी, टीवी देखने, गरीबी या फूड एलर्जी से एडीएचडी नहीं होता।

क्या है हल

शिक्षा व रचनात्मकता से इस स्थिति पर काबू पा सकते है। एडीएचडी वाले बच्चों के साथ ठीक से रहना चुनौती है, लेकिन हर चीज टाइम टेबल से करने पर मदद मिल सकती है।

ये करें...
रूटीन सेट करें
स्पष्ट सीमाएं निर्धारित करें, ताकि हर कोई जान ले कि किस तरह का व्यवहार अपेक्षित है।
संकेतों पर ध्यान दें
यदि लगे कि बच्चा आपा खो रहा है, तो उस पर ध्यान दें और उसे किसी अन्य गतिविधि में व्यस्त कर दें।

बच्चों को डांटना, मारने पीटने से भी अधिक घातक

ये कुछ बानगियां हैं, जिनमें थोड़ी सी डांट के बाद बच्चों ने इतना बड़ा कदम उठा लिया, जबकि आज से कुछ साल पहले मां-बाप बच्चों को पीट तक दिया करते थे, किंतु इस तरह की कोई घटना नहीं होती थी। विशेषज्ञों के अनुसार दरअसल बदलते जीवन मूल्यों के ये साइड इफेक्ट हैं। बच्चे तो क्या कोई भी किसी की सुनने को तैयार नहीं है। आखिर बच्चों के साथ कैसा बिहेव करें...

उदास और अकेलेपन का शिकार

एक अनुसंधान में भी इस बात का खुलासा हुआ है कि बच्चों को डांटना और उन पर चिल्लाना, उन्हें मारने से अधिक खतरनाक है। इस संबंध में विशेषज्ञों ने दो वर्षों तक ९५० छात्रों पर अध्ययन किया। परिणाम में उन बच्चों का व्यवहार जिन्हें घर में डांट पड़ती थी, दूसरे बच्चों से भिन्न था। ऐसे बच्चे उदास और अकेलपन का शिकार हो जाते हैं।

क्या पड़ता है असर

मस्तिष्क विकास में रुकावट : जब आप अपने बच्चे को डांटते हो तो ना सिर्फ इससे उनके मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ता है। कोई भी चिल्लाना पसंद नहीं करता है खासकर छोटे बच्चे बस रोना शुरू करेंगे और बड़े बच्चे इस आदत से ऊब जाएंगे। दोनों ही रिएक्शन दिखाते हैं बच्चे आपको सुनने में दिलचस्पी नहीं लेते।
दूरगामी परिणाम : बच्चे को हर समय डांटते रहने से उनका विश्वास टूटने लगता है। एक स्टडी के अनुसार बच्चे इससे डरना भी बंद कर देते हैं। उनमें आत्मविश्वास में कमी, बेचैनी या गुस्सा करने जैसी दीर्घकालिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

दुनिया भर में इस्तेमाल होता है...

दरअसल ऊंची आवाज में बात करना या सजा देना भी परवरिश के तरीकों में ही आता है जो दुनिया भर में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन अब इस पर सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञयों का कहना है कि इस तरीके पर फिर से विचार करना चाहिए क्योंकि ये आपके बच्चों के विकास में हानिकारक हो सकता है।
क्या है विकल्प- सबसे अच्छा विकल्प है मजाक या ह्युमर। बच्चे ही नहीं बड़े भी गलतियां करते हैं और ये नॉर्मल है। अगर पैरेंट्स थोड़ा सेंस ऑफ ह्युमर के साथ इससे निपटेंगे तो अच्छे नतीजे सामने आएंगे।