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Basoda Ki Kahani : एक बुढ़िया की कहानी जिसने बदल दिया पूरे गांव का भाग्य, जानें बसोड़ा का महत्व

Sheetla Ashtami 2026: बसोड़ा या शीतला अष्टमी 2026 कब है? जानें मां शीतला की पौराणिक कथा, क्यों इस दिन चूल्हा नहीं जलता और बासी भोजन क्यों खाया जाता है। पढ़ें बसोड़ा की पूजा विधि, महत्व और स्वास्थ्य से जुड़ा संदेश।

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भारत

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Manoj Vashisth

Mar 09, 2026

Basoda Ki Kahani

Basoda 2026: क्यों खाया जाता है बासी भोजन? जानें शीतला माता और बुढ़िया की चमत्कारी कथा (फोटो सोर्स: Gemini AI)

Basoda Ki Kahani : क्या आप जानते हैं कि हिंदू धर्म में एक ऐसा भी त्योहार है जहां चूल्हा नहीं जलता और माता को ताजे भोजन की जगह बासी भोजन का भोग लगाया जाता है? हम बात कर रहे हैं बसोड़ा यानी शीतला अष्टमी की। उत्तर भारत में बड़े उत्साह से मनाया जाने वाला यह पर्व न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि स्वास्थ्य और स्वच्छता का गहरा संदेश भी देता है।

वर्ष 2026 में शीतला सप्तमी 10 मार्च को और मुख्य बसोड़ा पर्व 11 मार्च को मनाया जाएगा। आइए जानते हैं कि आखिर क्यों इस दिन बासी खाना खाया जाता है और इसके पीछे की दिलचस्प कहानी क्या है।

जब धरती पर आई मां शीतला: एक अद्भुत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता शीतला ने यह देखने का मन बनाया कि धरती पर उनकी पूजा कौन और कैसे करता है। वे एक बूढ़ी औरत का रूप धरकर राजस्थान के डूंगरी गांव पहुंचीं। संयोगवश, उसी समय किसी ने अपने घर से उबले हुए चावल का गर्म पानी (मांड) बाहर फेंका, जो सीधे माता पर जा गिरा।

गर्म पानी से माता का पूरा शरीर जलने लगा और फफोले पड़ गए। वे दर्द से कराहती हुई पूरे गांव में मदद मांगने लगीं, लेकिन किसी ने उनकी सुध नहीं ली। अंत में, एक दयालु कुम्हारन ने उन्हें देखा। उसने तुरंत माता पर ठंडा पानी डाला और अपने घर में रखी ठंडी दही और राबड़ी उन्हें खाने को दी। ठंडी चीजों के सेवन और स्पर्श से माता की जलन शांत हुई।

जब कुम्हारन माता के बाल संवारने लगी, तो उसने उनके सिर के पीछे एक तीसरी आंख देखी। वह डर गई, तब माता ने अपने असली स्वरूप में दर्शन दिए। माता ने कुम्हारन की गरीबी देख उसके घर के कचरे और दरिद्रता को अपनी झाड़ू से साफ कर दिया और उसे वरदान मांगने को कहा।

वरदान में मांगी सुख-समृद्धि

कुम्हारन ने वरदान मांगा कि माता हमेशा इसी गांव में निवास करें और जो भी भक्त चैत्र कृष्ण अष्टमी को माता को ठंडा जल और बासी भोजन चढ़ाए, उसके घर में कभी बीमारी (जैसे चेचक, खसरा) और दरिद्रता न आए। माता 'तथास्तु' कहकर वहीं स्थापित हो गई, जिसे आज हम शील की डूंगरी के नाम से जानते हैं। राजस्थान के चाकसू (शील की डूंगरी) में इस अवसर पर विशाल मेला भरता है, जहां लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं।

क्यों जरूरी है बसोड़ा?

बसोड़ा का पर्व ऋतु परिवर्तन का संकेत है। होली के बाद गर्मी बढ़ने लगती है। आयुर्वेद के अनुसार, इस समय से शरीर को ठंडा रखने की जरूरत होती है। शीतला माता को ठंडक का प्रतीक माना जाता है।

बीमारियों से रक्षा: मान्यता है कि माता की पूजा से चेचक (Smallpox) और खसरा जैसी बीमारियों का प्रकोप शांत होता है।

स्वच्छता का संदेश: माता के हाथ में झाड़ू और डलिया सफाई का प्रतीक है, जो हमें सिखाता है कि रोगों से बचने के लिए साफ-सफाई अनिवार्य है।

कैसे मनाएं बसोड़ा? (पूजा विधि और परंपरा)

बसोड़ा के दिन घर में चूल्हा जलाना वर्जित होता है। सारा खाना एक दिन पहले (सप्तमी की रात) ही बना लिया जाता है।

पकवान: सप्तमी की शाम को राबड़ी, बाजरे की रोटी, मीठे चावल, गुलगुले और दही जैसे ठंडे पकवान तैयार किए जाते हैं।

पूजा सामग्री: थाली में राबड़ी, दही, चीनी, मूंग की दाल, हल्दी, बड़कुल्ला की माला और भीगे हुए मोठ-बाजरा रखें।

विधि: सुबह जल्दी ठंडे पानी से स्नान कर माता शीतला के मंदिर जाएं। वहां जल अर्पित करें और बासी भोजन का भोग लगाएं।

विशेष नियम: इस दिन सुई-धागे का काम नहीं किया जाता और पुरुष बाल नहीं कटवाते। महिलाएं अखंड सौभाग्य और संतान की लंबी उम्र के लिए यह व्रत रखती हैं।

अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यहां दी गई ज्योतिष, वास्तु या धार्मिक जानकारी मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। हम इसकी पूर्ण सटीकता या सफलता की गारंटी नहीं देते हैं। किसी भी उपाय, सलाह या विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित विशेषज्ञ या विद्वान से परामर्श अवश्य लें।