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कर्मफल के इस एक नियम को मानने से नहीं बुरे दिन

कर्म किसी का पीछा नहीं छोड़ते वे सदैव मनुष्य का पीछा करते रहते हैं। शरीर छूटने पर भी वे आत्मा से चिपके रहते हैं।

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Sunil Sharma

Jan 08, 2018

karma theory

karma theory in hindi

यह संसार कर्मफल व्यवस्था के आधार पर चल रहा है इसमें कोई दो राय नहीं है इसीलिए कहा जाता है कि जो जैसा बोता है वह वैसा काटता है। अर्थात हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती ही है। कर्मफल तत्काल मिले ऐसी विधि व्यवस्था इस संसार में नहीं है। जिस प्रकार से क्रिया और प्रतिक्रिया के बीच कुछ समय का अन्तराल रहता है। बीज बोते ही फल-फूलों से लदा वृक्ष सामने प्रस्तुत नहीं होता। उसके लिए धैर्य रखना होता है, उसी तरह कर्म को फल रूप में परिवर्तित होने की प्रक्रिया में कुछ समय तो लगता ही है।

यदि संसार में तत्काल कर्मफल प्राप्ति की व्यवस्था रही होती तो फिर मानवी विवेक एवं चेतना की दूरदर्शिता की विशेषता कुंठित हो जाती। मसलन, झूठ बोलते ही जीभ में छाले पड़ जाएं, चोरी करते ही हाथ में दर्द होने लगे, व्यभिचार करते ही कोढ़ हो जाएं तो फिर किसी के लिए भी दुष्कर्म कर सकना सम्भव न होता और केवल एक ही निर्जीव रास्ता चलने के लिए शेष रह जाता। ऐसी दशा में स्वतंत्र चेतना का उपयोग करने की, भले और बुरे में से एक को चुनने की विचारशीलता नष्ट हो जाती।

शरीर का पीछा नहीं छोड़ते कर्म
क हते हैं कि किए हुए कर्म किसी को छोड़ते नहीं हैं अर्थात वह मनुष्य का पीछा करते ही रहते हैं। मान लीजिए किसी व्यक्ति के साथ हमारा झगड़ा और हाथापाई हो गई। बात पुलिस और कोर्ट तक जा पहुंची। दुर्भाग्य से इसी बीच हमारा शरीर छूट जाता है। अब देखने में तो यही लगेगा कि मृत्यु के साथ ही हम उस कोर्ट कचहरी के चक्कर से मुक्त हो गए परंतु वास्तव में ऐसा नहीं है क्योंकि केस के दूसरी ओर खड़े व्यक्ति के मन में हमारी निरंतर याद बनी ही रहती है।

दुनिया के लिए भले ही हम दुनिया में नहीं हों लेकिन उसके द्वेष के सहभागी के रूप में उसके दिल में तो हम सालों साल जिंदा ही रहते हैं। इस संघर्ष के बीच कुछ वर्षों के बाद जब उसका भी शरीर छूट जाता हैं तो संभवत: वह सीधा हमारे आस-पास ही जन्म लेता है या दूर भी कहीं जन्म लेगा तो किसी न किसी कारण हमारा उससे संबंध जुड़ ही जाता है। सुनने में यह सब बड़ा विचित्र, अवास्तविक और अव्यवहारिक लगता है लेकिन कर्म सिद्धांत के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यही सत्य है।