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Swastik Meaning : क्यों हर शुभ कार्य की शुरुआत स्वस्तिक से होती है? जानिए इसका गहरा अर्थ

Spiritual significance of Swastikस्वस्तिक केवल एक चिन्ह नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति में शुभता, कल्याण और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। जानिए स्वस्तिक, ओम और भगवान गणेश से इसका गहरा आध्यात्मिक संबंध और दुनिया भर में इसका महत्व।

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भारत

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Manoj Vashisth

Jan 11, 2026

Swastik Meaning in Indian Culture

Swastik Meaning in Indian Culture :पूजा में स्वस्तिक कैसे बनाना चाहिए?

Swastik Meaning in Indian Culture : भारतीय संस्कृति में हर प्रतीक की अपनी जगह है। इनमें छुपे राज वही समझ पाते हैं जो इनका मतलब सच में जानते हैं, वरना बाकी लोगों के लिए ये बस एक और निशान भर हैं। स्वस्तिक भी ऐसा ही एक खास प्रतीक है। लोग इसे अक्सर सूर्य से जोड़ते हैं, लेकिन सच कहें तो स्वस्तिक के मायने इससे कहीं बड़े हैं। इसका मतलब है। जो आशीर्वाद दे, शुभ काम करे, या पुण्य का रास्ता दिखाए। जब भी कोई अच्छा या मंगल कार्य होता है, लोग वहां स्वस्तिक जरूर बनाते हैं।

स्वस्तिक और ‘ओम’

असल में, स्वस्तिक उसी जगह की पहचान है जहाँ अच्छाई, शुभता और कल्याण बसते हैं। इसमें बुराई या अशुभ का कोई नामोनिशान नहीं। इसमें सिर्फ भलाई और दूसरों के लिए अच्छे भाव छुपे होते हैं। इसलिए स्वस्तिक को हमेशा कल्याण की ताकत और शुभता का प्रतीक मानते हैं। भगवान गणेश की मूर्तियों में भी आप देखेंगे उनका सूंड, हाथ, पैर, सिर सबकुछ कुछ इस तरह से रचा गया है कि वो स्वस्तिक की चार भुजाओं जैसे दिखे। ‘ओम’ को भी स्वस्तिक से जोड़ते हैं। ‘ओम’ को सृष्टि की शुरुआत का आधार मानते हैं। इसमें वही शक्ति, वही ऊर्जा, वही जीवन छुपा है। भगवान के नामों में ‘ओम’ को सबसे ऊंचा दर्जा मिला है। यही वजह है कि स्वस्तिक को सर्वोच्च और सबसे शुभ प्रतीक मानते हैं।

स्वस्तिक और शुभ शुरुआत

शास्त्रों में साफ लिखा है स्वस्तिक शुभ और लाभ देने वाला है। पुराने जमाने में जब भी कोई अच्छा काम शुरू होता था, लोग सबसे पहले आवाहन लिखते थे। सबके लिए ऐसा लिखना आसान नहीं था, लेकिन हर कोई शुभता चाहता था। इसलिए ऋषियों ने स्वस्तिक का तरीका निकाला, जिससे हर कोई अपने काम की शुरुआत शुभता के साथ कर सके। आज भी पूजा-पाठ या किसी भी अच्छे काम में, लोग चावल या सिंदूर से वेदी पर स्वस्तिक बनाते हैं। ये न सिर्फ परंपरा है, बल्कि माना जाता है कि इससे सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। जहाँ भी स्वस्तिक बनता है, वहाँ की नकारात्मकता दूर होती है। ब्रह्मांड की पॉजिटिव एनर्जी अपने आप खिंच जाती है। सिंदूर या अष्टगंध से बने स्वस्तिक को तो खास शुभ और सात्विक मानते हैं। कहने का मतलब जहां स्वस्तिक है, वहां अच्छाई है, शुभता है।

दुनियाभर में स्वस्तिक की मौजूदगी

स्वस्तिक को लोग सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि दुनिया की कई पुरानी सभ्यताओं में भी जानते थे। हज़ारों साल पुरानी सभ्यताओं में इसके निशान मिले हैं। भारतीय संस्कृति में तो ये हिंदू, बौद्ध और जैन तीनों ही धर्मों में शुभता और सौभाग्य का प्रतीक है। हिंदू धर्म में इसे सूर्य, भगवान विष्णु, ‘ओम’ और पूरे ब्रह्मांड से जोड़ते हैं। बौद्ध धर्म में ये बुद्ध के पदचिह्न का निशान है, जैन धर्म में 24 तीर्थंकरों में से एक का प्रतीक। सिंधु घाटी सभ्यता यानी 3,000 ईसा पूर्व वाली पुरानी मुहरों में भी स्वस्तिक मिलता है। साफ है, स्वस्तिक सिर्फ एक धार्मिक चिन्ह नहीं, बल्कि एक ऐसा सार्वभौमिक प्रतीक है जिसे अलग-अलग संस्कृतियों में हमेशा शुभता और कल्याण के लिए माना गया है। भारत में इसका आध्यात्मिक महत्व तो है ही, लेकिन ये पूरी दुनिया के लिए भी एक खास निशान है।

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