
शक्ति की शिला पर भक्ति का आलेख है नवरात्र। सज्जनों को प्यार और दुर्जनों पर प्रहार का नाम है नवदुर्गा। सप्तम (सातवां) नवरात्र में मां दुर्गा की मूर्ति है कालरात्रि। सबको मारने वाले काल की भी रात्रि (विनाशिका) होने से उनका नाम कालरात्रि है। नाम से कालरात्रि होने के बावजूद यह मां दुर्गा का सहज स्वरूप है।
यह भक्तों के लिए अर्चन-वंदन का रूप है अर्थात आराधना की मूर्ति है, लेकिन जब भक्तों को सताया जाता है, सदाचारियों को प्रताडि़त किया जाता है, तब मां दुर्गा अपने भक्तों अर्थात सज्जनों की सुरक्षा के लिए हुंकार भरती हैं और रौद्र रूप में दुर्जनों का संहार करती हैं। तब मां दुर्गा दरअसल देवी दुर्गा हो जाती है। इस प्रकार कालरात्रि है ‘मूर्ति’ किंतु दुष्टों के दलन के लिए देवी दुर्गा की व्याप्त है ‘कीर्ति’। एक वाक्य में यह कि सप्तम नवरात्र में कालरात्रि है ‘सूरत’, देवी दुर्गा है ‘सीरत’। खुलासा यह है कि पूजनीया मुखाकृति है कालरात्रि, लेकिन दंडाधिकारी कार्य प्रकृति है देवी दुर्गा। मां दुर्गा की कालरात्रि ‘सूरत’ में सज्जनों के लिए स्नेह-सराहना है किंतु देवी दुर्गा की दंडाधिकारी ‘सीरत’ में दुष्टों के लिए प्रकोप-प्रताडऩा है।
श्री दुर्गा सप्तशती में वर्णित ‘दुर्गा’ शब्द की व्याख्या में ‘पीठ-टिप्पणी’ के छठे संदर्भ में कहा गया है...
दु:खेन अष्टांग योग कर्मोपासनारूपेण
क्लेशेन गम्यते प्राप्यते या सा दुर्गा
अर्थात ‘जो अष्टांग योग, कर्म एवं उपासना रूप दु:साध्य साधन से प्राप्त होती है, वे जगदम्बिका ‘दुर्गा’ कहलाती हैं।’
सातवें नवरात्र की मां दुर्गा की सहज स्नेह की कालरात्रि की मूर्ति, दुष्टों को दंडित करने के लिए देवी दुर्गा होकर पराक्रम की प्रतिमूर्ति हो जाती है। पराक्रम की प्रस्तुति के कारण वीरता की वर्णमाला हैं देवी दुर्गा। पराक्रम दरअसल देवी दुर्गा का हस्ताक्षर है। देवी दुर्गा ने दुष्ट-दंभी ‘दुर्गम’ दैत्य का दर्प दलन करके उसका संहार किया था, इसीलिए उनका नाम दुर्गा पड़ा।
मार्कण्डेय पुराण के देवी माहात्म्य के ‘देवीस्तुति’ नामक ग्यारहवें अध्याय के ४९वें श्लोक के उत्तरार्ध में स्वयं देवी ने अपने अवतरित होने की बात इस प्रकार कही है...
‘तत्रैव च वधिष्यामि दुर्गम...महासुरम’
अर्थात ‘मैं दुर्गम नामक महादैत्य (महाअसुर) का
वध भी करूंगी।’
‘दुर्गा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति’।
अर्थात ‘इससे मेरा नाम दुर्गा देवी के रूप में प्रसिद्ध होगा’।
देवी दुर्गा की कथा का सारांश यह है कि एक समय जब दुर्गम नामक दैत्याधिपति अर्थात महाअसुर ने किसी वरदान से इतनी शक्ति प्राप्त कर ली कि वह दंभ से युक्त होकर अत्याचार करने लगा। यहां तक कि विष्णु, ब्रह्मा, शिव उसे परास्त करना तो दूर उसके पास फटक भी नहीं सकते थे। तब देवी दुर्गा ने सिंह पर सवार होकर पराक्रम का प्रदर्शन किया और दुर्गम दैत्य को मारकर तीनों लोकों को अभय दान दे दिया।
Published on:
27 Sept 2017 09:43 am
बड़ी खबरें
View Allधर्म और अध्यात्म
धर्म/ज्योतिष
ट्रेंडिंग
