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Phalen Holika Dahan Story: होलिका दहन की रात ब्रज के फालैन में दिखता है चमत्कार, आग के बीच से सुरक्षित निकलता है पुजारी

Phalen Holika Dahan Story, Holi 2025: होलिका दहन की रात ब्रज के फालैन गांव में आस्था का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है। धधकती अग्नि के बीच से गांव का पुजारी नंगे पांव सकुशल निकलता है, जिसे श्रद्धालु चमत्कार मानते हैं। यह परंपरा भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति का प्रतीक मानी जाती है।

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भारत

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MEGHA ROY

Feb 23, 2026

Phalen Holi Viral Tradition, Miracle of Phalen Holi,

Holika Dahan Fire Walking India|फोटो सोर्स- Freepik

Phalen Holika Dahan Story, Holi 2026: ब्रज भूमि में होली का रंग कुछ अलग ही होता है, लेकिन मथुरा जिले के छोटे से गांव फालैन में यह पर्व केवल रंगों तक सीमित नहीं रहता। यहां होलिका दहन की रात ऐसा दृश्य देखने को मिलता है, जिसे लोग चमत्कार से कम नहीं मानते। हजारों ग्रामीणों और दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं की मौजूदगी में जलती हुई अग्नि के बीच से मंदिर का पुजारी सकुशल निकलता है और यही इस गांव की पहचान बन चुका है।

पौराणिक कथा से जुड़ी परंपरा

होलिका दहन की जड़ें उस कथा में हैं, जिसमें असुर राजा हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को भगवान विष्णु की भक्ति के कारण दंडित करना चाहा। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था। वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी, लेकिन अंत में भक्ति की जीत हुई प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जलकर भस्म हो गई। इसी घटना की स्मृति में देशभर में होलिका दहन किया जाता है।

Holika Dahan 2026: उपलों का पहाड़ और अग्नि परीक्षा

फालैन में होलिका दहन के लिए गोबर के उपलों का विशाल ढेर तैयार किया जाता है। ग्रामीण इसे ‘उपलों का पहाड़’ कहते हैं। रात होते ही इसमें अग्नि प्रज्वलित की जाती है, और देखते ही देखते आग की लपटें आसमान को छूने लगती हैं।गांव के बाहर स्थित प्रह्लाद मंदिर इस आयोजन का केंद्र है। मंदिर के पास ही एक प्राचीन कुंड है, जिसके बारे में मान्यता है कि यहीं से प्रह्लाद की प्रतिमा और उनकी माला प्रकट हुई थी। यही माला इस परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।

45 दिन का व्रत और अटूट विश्वास

मंदिर के पुजारी का परिवार कई पीढ़ियों से इस परंपरा को निभाता आ रहा है। होलिका दहन से पहले पुजारी करीब 40 से 45 दिनों तक कठोर नियमों का पालन करते हैं ब्रह्मचर्य व्रत, सात्विक भोजन और विशेष पूजा-पाठ। ग्रामीणों का विश्वास है कि इस तपस्या के बाद अग्नि भी उन्हें नुकसान नहीं पहुंचा पाती।होलिका दहन की तड़के सुबह पुजारी कुंड में स्नान करते हैं। शरीर पर केवल पीला गमछा और गले में प्रकट हुई माला धारण कर वे धधकती अग्नि की ओर बढ़ते हैं। चारों ओर सन्नाटा छा जाता है। जैसे ही वह जलते उपलों के बीच से निकलते हैं, भीड़ ‘प्रह्लाद महाराज की जय’ के जयकारों से गूंज उठती है। आश्चर्य की बात यह है कि अग्नि की लपटें उन्हें छू भी नहीं पातीं।

आस्था और उत्साह का संगम

फालैन में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि विश्वास और परंपरा का उत्सव है। गांव के घर दीपावली और शादियों की तरह सजाए जाते हैं। लोग दूर-दूर से इस दृश्य को देखने आते हैं। उनके लिए यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि प्रह्लाद की भक्ति और ईश्वर की कृपा का जीवंत प्रतीक है।