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Sakat Chauth Vrat Katha: बिना इस कथा को पढ़े सकट चौथ व्रत माना जाता है अधूरा

Sankashti Chaturthi (Sakat Chauth) Vrat 2022: सकट चौथ को लेकर ऐसी मान्यता है कि जो कोई व्यक्ति इस दिन सच्चे मन के साथ व्रत रख गणेश भगवान की अराधना करता है उसके सभी कष्ट, दुख और पाप दूर हो जाते हैं।

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सकट चौथ कथा

Sakat Chauth Katha (सकट चौथ कथा): सकट चौथ या संकष्टी चतुर्थी का काफी महत्व माना जाता है। ये व्रत संतान की लंबी आयु और खुशहाल जीवन के लिए रखा जाता है। वैसे तो प्रत्येक महीने में दो गणेश चतुर्थी आती है लेकिन माघ माह में आने वाली संकष्टी चतुर्थी को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस बार ये पर्व 21 जनवरी को मनाया जा रहा है। ये व्रत सुबह सूर्योदय के साथ शुरू हो जाता है और रात को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद इस व्रत की समाप्ति होती है। इस दिन तिल और गुड़ से बनी चीजें बनाई जाती हैं और इन्हीं चीजों का भगवान को भोग लगाया जाता है और फिर प्रसाद स्वरूप इसे ग्रहण किया जाता है। इसी के चलते इसे तिलकुटा चौथ भी कहा जाता है। जानिए इस व्रत से जुड़ी पौराणिक व्रत कथा।

एक पौराणिक व्रत कथा के अनुसार एक नगर में एक कुम्हार रहता था। एक बार जब उसे बर्तन बनाकर आवा लगाया तो आवा पका ही नहीं। ये देखकर कुम्हार परेशान होकर राजा के पास गया। राजा ने पंडित को बुलाकर इसके पीछे की वजह जाननी चाही। पंडित ने कहा यदि हर दिन गांव के एक-एक घर से एक-एक बच्चे की बलि दी जाए तब ये आवा रोज पकेगा। राजा ने आज्ञा दी की पूरे नगर से हर दिन एक बच्चे की बलि दी जाए। राजा ने आज्ञा दी की पूरे नगर से हर दिन एक बच्चे की बलि दी जाए।

राजा की आज्ञा के अनुसार हर परिवार से एक दिन एक बच्चा बलि के लिए भेजा जाने लगा। इसी तरह कुछ दिन बीते और कुछ दिनों बाद एक बुढ़िया के लड़के की बारी आई। बुढ़िया परेशान हो गई। वो अपना लड़का भेजना नहीं चाहती थी। क्योंकि उसके बुढ़ापे का एकमात्र सहारा उसका बेटा ही था। ऐसे में बुढ़िया राजा के पास गई और बोली, 'मेरा एक ही बेटा है और वह भी इस बलि के चक्कर में मुझसे दूर हो जाएगा'।

बुढ़िया को एक उपाय सूझा उसने अपने बेटे को बलि पर भेजने से पहले एक सकट की सुपारी और दूब का बेड़ा देकर कहा तुम भगवान का नाम लेकर आवा में बैठ जाना सकट माता तुम्हारी रक्षा करेंगी। जब बुढ़िया के बेटे को आवा में बिठाया गया तो बुढ़िया अपने बेटे की रक्षा के लिए पूजा-पाठ करने लगी। जिसके प्रभाव से जो आवा पहले पकने में कई दिन लग जाते थे इस बार वह एक ही रात में पक गया और सुबह जब कुम्हार ने आवा देखा तो आवा भी पक चुका था और बुढ़िया का बेटा भी सलामत था। सकट माता की कृपा से नगर के वो बच्चे जिनकी पहले बलि दी गई थी वो भी जीवित हो उठे। तभी से नगर वासियों ने मां सकट की महिमा को स्वीकार कर सकट माता की पूजा और व्रत का विधान शुरू कर दिया।
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