
Stambheshwar Mahadev Temple: "स्थानीय मान्यताओं के अनुसार सरसों के तेल से अभिषेक करने पर ग्रह दोष दूर होने की मान्यता है। (फोटो सोर्स: stambheshwarmahadev.com)
Stambheshwar Temple Gujarat: क्या आपने कभी किसी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है जो पलक झपकते ही आपकी आंखों के सामने से गायब हो जाए? विज्ञान भले ही इसे कुदरत का करिश्मा कहे, लेकिन आस्था इसे साक्षात महादेव की महिमा मानती है। गुजरात के भरूच जिले में अरब सागर के तट पर बसा स्तंभेश्वर महादेव मंदिर (Stambheshwar Temple) एक ऐसा ही भूगर्भीय और आध्यात्मिक रहस्य है, जो दिन में दो बार समंदर के सीने में पूरी तरह समा जाता है।
स्कंद पुराण और शिव पुराण (रुद्र संहिता) के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास त्रेतायुग से भी पुराना है। शिव पुत्र भगवान कार्तिकेय ने जब तीनों लोकों को प्रताड़ित करने वाले महाबली राक्षस तारकासुर का वध किया, तब उन्हें ज्ञात हुआ कि तारकासुर महादेव का परम भक्त था। वध के बाद कार्तिकेय आत्मग्लानि और अशांति से भर गए। तब भगवान विष्णु ने उन्हें सांत्वना दी और राह दिखाई कि जहां वध हुआ है, वहां शिवालय की स्थापना करें, जिससे उनका मन शांत होगा। कार्तिकेय ने महिसागर संगम तीर्थ पर इस शिवलिंग की स्थापना की, जिसे आज हम स्तंभेश्वर महादेव के नाम से पूजते हैं।
आमतौर पर देशभर के शिव मंदिरों में भोलेनाथ का जलाभिषेक पानी, दूध, शहद या पंचामृत से होता है। लेकिन, स्तंभेश्वर महादेव में एक बिल्कुल अनोखी परंपरा सदियों से निभाई जा रही है। यहां महादेव का विशेष रूप से सरसों के तेल से अभिषेक किया जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार सरसों के तेल से अभिषेक करने पर ग्रह दोष दूर होने की मान्यता है।
जैसे ही आप मंदिर परिसर में प्रवेश करते हैं, सबसे पहले भगवान नंदी की एक अत्यंत विशाल और विहंगम मूर्ति आपका स्वागत करती है। नंदी के ठीक सामने बने मुख्य भव्य मंडप के केंद्र में 4 फीट ऊंचा और 2 फीट व्यास वाला दिव्य शिवलिंग स्थापित है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| वडोदरा से दूरी | लगभग 75 किलोमीटर |
| अहमदाबाद से दूरी | लगभग 160 किलोमीटर |
| शिवलिंग का आकार | ऊँचाई: 4 फीट, व्यास: 2 फीट |
| मुख्य पर्व और मेले | हर महाशिवरात्रि और प्रत्येक अमावस्या |
समंदर के खारे पानी की थपेड़े और तेज रफ्तार लहरें किसी भी मजबूत से मजबूत सीमेंट-कंक्रीट की इमारत को कुछ ही सालों में खंडहर बना देती हैं। लेकिन स्तंभेश्वर मंदिर के विशाल पत्थर के खंभे (स्तंभ) सदियों से बिना किसी नुकसान के सीना ताने खड़े हैं। समुद्र की भयानक लहरें रोज इन खंभों से टकराकर दम तोड़ देती हैं, मगर मंदिर का बाल भी बांका नहीं होता। यही कारण है कि इसे स्तंभेश्वर नाम दिया गया है। वैज्ञानिक भी इस बात पर हैरान हैं कि इतने दशकों से खारे पानी में डूबे रहने के बाद भी इस संरचना को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है।
अगर आप भी इस जादुई नजारे को अपनी आंखों में कैद करना चाहते हैं, तो आपको इस मंदिर को पूरा एक दिन देना होगा। स्थानीय प्रशासन और मंदिर प्रबंधन द्वारा यहां आने वाले श्रद्धालुओं को विशेष पर्चे (बुलेटिन) बांटे जाते हैं, जिसमें ज्वार-भाटा (Tide Timings) का सटीक समय लिखा होता है। हाई टाइड के दौरान किसी को भी तट या मंदिर के पास जाने की अनुमति नहीं होती है। लहरें जब धीरे-धीरे वापस जाती हैं और सूर्य की किरणों के बीच जब भीगा हुआ मंदिर दोबारा बाहर निकलता है, तो वह दृश्य इतना अलौकिक होता है कि सैलानी मंत्रमुग्ध रह जाते हैं।
Published on:
19 Jun 2026 12:16 pm
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