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Jagannath Rath Yatra 2026: राजा इंद्रद्युम्न की रानी गुंडिचा से क्या है भगवान जगन्नाथ का संबंध? जानिए कथा

Jagannath Rath Yatra 2026 में भगवान जगन्नाथ हर साल गुंडिचा मंदिर क्यों जाते हैं? जानिए रानी गुंडिचा, राजा इंद्रद्युम्न और भगवान के पुत्र बनने की भावुक कथा।

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भारत

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Manoj Vashisth

Jun 19, 2026

Queen Gundicha Story, Jagannath Rath Yatra 2026

Jagannath Rath Yatra 2026 : भगवान जगन्नाथ हर साल गुंडिचा मंदिर क्यों जाते हैं? जानिए रानी गुंडिचा, राजा इंद्रद्युम्न और भगवान जगन्नाथ की भावुक कथा। (फोटो सोर्स : AI@chatgpt)

Jagannath and Gundicha Relationship: पुरी रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ हर साल गुंडिचा मंदिर जाते हैं। मान्यता है कि यह मंदिर रानी गुंडिचा से जुड़ा है, जिन्हें भगवान ने अपनी मां का दर्जा दिया था। इसी कारण रथयात्रा का यह पड़ाव सबसे भावुक माना जाता है। 16 जुलाई 2026 से विश्व प्रसिद्ध पुरी रथ यात्रा का शंखनाद होने जा रहा है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ तीन विशाल रथों पर सवार होकर अपनी मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर जाते हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर रानी गुंडिचा (Rani Gundicha) कौन थीं और भगवान हर साल उनसे मिलने क्यों तड़प उठते हैं? इसके पीछे छिपी है पति-पत्नी के अनूठे विवाद और भगवान के लाला बनने की एक बेहद भावुक कथा।

राजा इंद्रद्युम्न और उनकी पत्नी रानी गुंडिचा की कथा (Queen Gundicha Story)

पौराणिक इतिहास के अनुसार, पुरी मंदिर का निर्माण कराने वाले राजा इंद्रद्युम्न और उनकी पत्नी रानी गुंडिचा परम भक्त थे। एक बार भगवान जगन्नाथ ने प्रसन्न होकर दोनों को अलग-अलग वरदान मांगने को कहा। राजा इंद्रद्युम्न ने हाथ जोड़कर ऐसा वरदान मांगा जिसे सुनकर सब स्तब्ध रह गए। उन्होंने कहा, प्रभु! मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मेरा वंश यहीं रुक जाए। मेरे बाद कोई वारिस न हो। जब भगवान ने इसका कारण पूछा, तो राजा बोले कि उन्हें डर है कि भविष्य में उनकी पीढ़ी में अगर भगवान के प्रति ऐसा प्रेम न रहा, तो लोग कहेंगे कि देखो यह इंद्रद्युम्न का वंशज है और इसे भगवान से प्रेम नहीं है। वे भगवान के नाम पर किसी भी तरह का अहंकार या कलंक नहीं चाहते थे।

कैसे भगवान जगन्नाथ बने रानी गुंडिचा के पुत्र

राजा की बात सुनकर भगवान ने 'तथास्तु' कह दिया। लेकिन पास ही बैठी रानी गुंडिचा ने तुरंत विरोध किया। उन्होंने कहा, "प्रभु! एक मां का सुख तो बालक की किलकारी से ही पूरा होता है। मुझे आपकी सेवा करने वाला एक पुत्र चाहिए।" अब भगवान असमंजस में पड़ गए; पति कह रहा था वंश खत्म हो जाए और पत्नी को पुत्र चाहिए था। दोनों में मीठी तकरार होने लगी।

तब भगवान जगन्नाथ ने बीच का रास्ता निकालते हुए कहा, आप दोनों की इच्छा पूरी होगी। राजा इंद्रद्युम्न का वंश आगे नहीं बढ़ेगा, लेकिन रानी गुंडिचा, आज से जब तक इस सृष्टि में सूर्य-चंद्र रहेंगे, मैं स्वयं आपका पुत्र (लाला) बनकर रहूंगा। लोककथाओं के अनुसार भगवान ने वचन दिया कि वे हर साल अपने जन्मदिन (स्नान पूर्णिमा) के 15 दिन बाद रथ पर सवार होकर अपनी इस मां और मौसी के घर आएंगे।

गुंडिचा मंदिर में भगवान जगन्नाथ की विशेष परंपराएं

जब भगवान जगन्नाथ 3 किलोमीटर दूर गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं, तो वहां उनका स्वागत भगवान के रूप में नहीं, बल्कि घर के एक छोटे बच्चे यानी लाला की तरह होता है। रानी गुंडिचा के मंदिर में उनके लिए विशेष रूप से 'पोड़ा पीठा' (मीठे चावल और दाल का पारंपरिक व्यंजन) और रसगुल्ले बनाए जाते हैं।

बीमार होने की परंपरा: लोक मान्यताओं के अनुसार, मौसी के घर प्यार में भगवान इतने पकवान छककर खा लेते हैं कि वे बीमार पड़ जाते हैं। इसके बाद 8 से 9 दिनों तक उनका प्रतीकात्मक इलाज किया जाता है, उन्हें काढ़ा दिया जाता है और पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद ही उनकी 'बहुड़ा यात्रा' (मुख्य मंदिर वापसी) होती है।

Jagannath Rath Yatra 2026 की धार्मिक मान्यता

इस दिव्य रथ यात्रा की महिमा शास्त्रों में अपार बताई गई है। सनातन धर्म में मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से इस रथ यात्रा में शामिल होता है और भगवान के रथ की रस्सी को स्पर्श कर उसे खींचता है, उसे आवागमन के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। यही कारण है कि इस अलौकिक दृश्य का गवाह बनने और भगवान के पुत्र रूप के दर्शन करने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालुओं का हुजूम ओडिशा की पावन धरती पर उमड़ पड़ता है। 2026 की इस रथयात्रा को लेकर भी प्रशासन और भक्तों में भारी उत्साह देखा जा रहा है।

अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यहाँ दी गई ज्योतिष, वास्तु या धार्मिक जानकारी मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। हम इसकी पूर्ण सटीकता या सफलता की गारंटी नहीं देते हैं। किसी भी उपाय, सलाह या विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित विशेषज्ञ या विद्वान से परामर्श अवश्य लें।