
इस दिन देवी भूवनेश्वरी की आराधना की जाती है। बात यदि शास्त्रों के बारे में की जाए तो देवी भुवनेश्वरी को दस महाविद्याओं में चौथा स्थान प्राप्त है। देवी भुवनेश्वरी सम्पूर्ण ब्रह्मांड का भरन-पोषण करती है और इसी कारण उन्हें जगत-धात्री के नाम से भी जाना जाता है।
भुवनेश्वरी देवी आसमान से लेकर धरती का निर्माण कर उसे संचालित करती है और इसीलिए उन्हें प्रकृति की मां के रूप में भी जाना जाता है। देवी भुवनेश्वरी अपने माथे में चंद्रमा को समाएं हुए है। देवी भुवनेश्वरी के चार हाथ है जिनमें से दो हाथ वरद मुद्रा और अंकुश मुद्रा भक्तों की रक्षा करती है और बाकी के दो हाथ पाश मुद्रा और अभय मुद्रा दानवों का विनाश करते हैं।
विश्व का वमन करने हेतु देवी को वामा, शिवमय होने के कारण ज्येष्ठा, जीवों को दंड देने के लिए रौद्राऔर इसके साथ ही प्रकृति का निरूपण करने हेतु मूल प्रकृति कहलाती है। इन्हें ओम शक्ति ? के नाम से भी जाना जाता है। यदि कोई व्यक्ति एकाग्र मन से देवी भुवनेश्वरी का पूजा करें तो उसके जीवन से पेरशानियां दूर होकर समृद्धि आती है।
कल देवी भुवनेश्वरी की पूजा करने हेतु शाम 5:30 से 6:30 के बीच किसी शिव मंदिर में जाकर देवी का दशोपचार करें। मंदिर में गाय के घी का दीपक व कर्पूर जलाएं। सफेद फूल, चंदन,चावल, दूध, शहद व इत्र चढ़ाएं तत्पश्चात मावे का भोग लगाएं।
इसके बाद "ऊं श्रीभुवनेश्वर्यै नम:॥" इस मंत्र का एक माला जाप जाप करें। कुछ महत्वपूर्ण नियमों व उपायों का पालन कर आप अपनी कुछ परेशानियों को दूर कर सकते हैं जैसे कि यदि आप अपने किसी मनोकामना को पूरा कर चाहते हैं तो इसके लिए देवी पर चढ़ाएं गए अक्षत को अपने शयनकक्ष में छिपाकर रख दें और इसके साथ ही यदि आप अपनी पारिवारिक समस्याओं से पीछा छुड़ाना चाहते हैं तो देवी को 12 सफेद फूल चढ़ाएं।
देवी की पूजा से व्यक्ति को धन, बल, शक्ति और यश की प्राप्ति होती थी। भारत के दक्षिणी प्रांत के केरल में देवी को शक्तास के नाम से जाना जाता है।
Published on:
11 Mar 2018 11:08 am
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