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जीवन को सम्पूर्णता की ओर ले जाता है योग

प्राचीनकाल में ऋषि, महर्षि योग के अनुसार जीवन जीते हुए आध्यात्मिक प्रकृष्टता या श्रेष्ठता को प्राप्त करते थे।

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Sunil Sharma

Apr 06, 2018

yoga, meditation

yoga girl

संसार में पदार्पण के साथ व्यक्ति की जीवन यात्रा शुरू होती है। जीवन सभी जीते हैं किन्तु किस प्रकार का जीवन सम्यक् हो, इसका भान सबको नहीं होता है। प्राय: लोग आधा-अधूरा जीवन जीते है और जीवन को कोसते हुए अपनी जीवन यात्रा को समाप्त कर लेते हैं। उनके आने-जाने के बीच समय की बरबादी के सिवाय कुछ उपलब्ध नहीं होता है किन्तु कुछ ऐसे लोग होते हैं जो आंशिक, एकांगिक जीवन नहीं जीते अपितु सम्पूर्ण जीवन जीते हैं।

उन्हें यह ज्ञात होता है कि सम्यक् और सम्पूर्ण जीवन जीने का आधार योग है। प्राचीनकाल में ऋषि, महर्षि योग के अनुसार जीवन जीते हुए आध्यात्मिक प्रकृष्टता या श्रेष्ठता को प्राप्त करते थे। प्रात: काल की साधना से लेकर संध्या वंदन तक उनके प्रत्येक कार्य योग के अनुसार होते थे। शायद यही वजह है कि उन्हें आश्र्यजनक सिद्धियां मिलती थी।

भगवान महावीर के अनुसार चेतना का व्यापार ही आत्मा है। ‘चेतना लक्षणों जीव:’ अर्थात् आत्मा का लक्षण चेतना है। यह चेतना जब पुद्गल (अचेतन द्रव्य) से युक्त होती है तो बंधन होता हैं। आत्मा को बंधनमुक्त कर परमात्मा से संयोग कराने का माध्यम योग है। ध्यान की अवस्था में स्वरूपाभ्यास की आवृत्ति कम होकर समाधि में पहुंचने से स्वचिन्तन रहित हो जाती है। यही समाधि है, जो योग को परिभाषित करती है। वाराहोपनिषद् में मन का आत्मा के साथ एकाकार होना ही योग माना गया है। तत्त्वोपनिषद् में जीवात्मा तथा परमात्मा के संयोग को योग कहा गया है। प्रेम और खुशियों के संयोग को भी योग कहा गया है।

आत्मा से परमात्मा की ओर
योग शब्द का अर्थ होता है मेल या संयोग। किसका योग और किससे? प्रत्येक व्यक्ति चेतन प्राणी है। चेतन प्राणी से तात्पर्य हर व्यक्ति में आत्मा है। आत्मा के बिना तो शरीर मुर्दा होता है। भगवान महावीर के अनुसार चेतना का व्यापार ही आत्मा है। ‘चेतना लक्षणों जीव:’ अर्थात आत्मा का लक्षण चेतना है। यह चेतना जब पुद्गल से युक्त होती है तो बंधन होता हैं। आत्मा को इस अवस्था से मुक्त कर परमात्मा से संयोग कराने का माध्यम योग है। योग ‘संयोग’ अर्थ में सार्थक है, आत्मा का परमात्मा से संयोग ही योग है।

योग से समाधि की प्राप्ति
समाधि वह अवस्था है जहां किसी प्रकार की आधि, व्याधि नहीं रह जाती है। गौतम बुद्ध के अनुसार यह चित्त की शान्त अवस्था है। इस अवस्था में समस्त वृत्तियों का शमन हो जाता हैं यह मन के समस्त वृत्तियों के निरोध की अवस्था है। इस अवस्था में ध्याता ध्येयाकार हो जाता है और उसका स्वरूप शून्य हो जाता है। इस अवस्था में ध्यान भी छूट जाता है। केवल आत्मा के अस्तित्व मात्र का बोध होता है। महर्षि पतंजलि के अनुसार ध्याता, ध्यान और ध्येय इन तीनों की एकरूपता जहां होती है, उसे समाधि कहते हैं।

गीता में त्रियोग की भूमिका
गीता में ‘योग: कर्मसु कौशलम’ एवं ‘समत्वं योगोच्यतो’ का आर्षवाक्य प्रसिद्ध है अर्थात् निष्काम कर्म में दक्षता योग है। समता को भी योग माना है। गीता के अनुसार सुख-दु:ख, हानि-लाभ, जय-पराजय में जो सम रहता है, वह योगी है। कर्म करते हुए कर्म में अनासक्त रहता है वह योगी है। भगवान में जो अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है वह भक्त भी योगी है। गीता का ज्ञानयोग, भक्तियोग एवं कर्मयोग प्रसिद्ध है। अस्तु योग साधना की श्रेष्ठतम अवस्था आत्मसाक्षात्कार है। यहां तक पहुंचने पर त्वम् एवं अहं का भेद नहीं रह जाता है।

वृत्तियों की शुद्धि करता है योग
महर्षि पतंजलि कहते हैं कि चित्त में प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा एवं स्मृति ये पंाच वृत्तियां हैं। जब तक ये वृत्तियां चित्त में है तब तक चित्त किसी विषय पर केन्द्रित नहीं हो सकता। अत: चित्त की इन वृत्तियों का निरोधकर चित्त को शुद्ध करना आवश्यक है। यह शुद्धिकरण केवल और केवल योग के द्वारा ही संभव है।

योग से मिलती विलक्षण सिद्धि
शंकराचार्य के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने योग से ऐसी सिद्धि प्राप्त कर ली थी कि वे अपने शरीर को छोटा, बड़ा एवं हल्का-भारी कर लेते थे। भक्त शिरोमणि हुनमान जी को भी यह सिद्धियां मिली थीं। जब वे माता सीता का पता लगाने लंका जा रहे थे तो सुरसा नाम की राक्षसी ने उनका रास्ता रोका। वे अपना शरीर बढ़ाते गए और सुरसा माया से अपना शरीर बढ़ाती गई। हनुमान जी अति लघुरूप धारण कर निकल गए। वशिष्ठ, विश्वामित्र, अगत्स्य आदि को भी ये सिद्धियां प्राप्त थीं। योग साधना से अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, यत्रकामावशाइत्व आदि सिद्धियां प्राप्त होती हैं किन्तु माना जाता है कि कोई भी योगी सिद्धियों के लिए योग नहीं करता है अपितु ये सिद्धियां योग साधना काल में योगी को स्वत: प्राप्त होती हैं।