कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देव उठनी एकादशी, देव प्रबोधिनी एकादशी या देव उठनी ग्यारस भी कहा जाता है। इस दिन व्रत रखने और विष्णुजी की विधिपूर्वक पूजा का महत्व है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी पर विष्णुजी चार माह के बाद शयन से उठते हैं इसलिए इस तिथि को देवउठनी एकादशी या देवउठनी ग्यारस कहा जाता है.
ज्योतिषाचार्य और धर्म शास्त्री बताते हैं कि देवउठनी ग्यारस के दिन विष्णुजी की पूजा का त्वरित फल मिलता है. इस दिन जो बिल्व पत्र से भगवान विष्णु का पूजन करते हैं, उन्हें अंत में मुक्ति मिलती है। तुलसीजी अर्पित करने पर दस हजार जन्मों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। दूर्वादल चढाने पर सौ गुना ज्यादा फल मिलते हैं। शमीपत्र से पूजन करनेवाले यमराज के भयानक मार्ग को सुगमता से पार कर जाते हैं।
इस दिन विष्णुजी को अलग—अलग फूल अर्पित करने के भी अलग—अलग फल बताए गए हैं। इस दिन जो भक्त भगवान का अगस्त्य पुष्प से पूजन करते हैं, उनके सामने इन्द्र भी नतमस्तक हो जाते हैं। सफेद और लाल कनेर के फूलों से पूजन करनेवालों पर भगवान अति प्रसन्न होते हैं। गुलाब के पुष्प से विष्णु पूजन करने पर मुक्ति प्राप्त होती है।
पीले और रक्त वर्ण कमल के सुगंधित पुष्पों से भगवान का पूजन करनेवालों को श्वेत दीप में स्थान मिलता है। बकुल और अशोक के पुष्पों से पूजन करनेवाले शोक से रहित रहते हैं। चंपक पुष्प से विष्णुजी की पूजा करनेवाले जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाते हैं। स्वर्ण से बना केतकी पुष्प भगवान को अर्पित करने वालों के करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
सनातन धर्म ग्रंथों के अनुसार विष्णुजी को कदंब के फूल सबसे प्रिय हैं. इसलिए एकादशी पर कदंब पुष्प से उनकी पूजा करना सबसे उत्तम माना गया है। भगवान विष्णु कदंब पुष्प को देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं। कदंब पुष्प से भगवान का पूजन करनेवालों को यमराज के कष्टों से सामना नहीं होता। विष्णुजी उनकी सभी कामनाओं को पूरा करते हैं।
Published on:
14 Nov 2021 10:47 am
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