
Hindu New Year 2026: भारत का सबसे पुराना कैलेंडर कौन-सा है? (फोटोः एआई)
New Year 2026, उज्जैन। दुनिया भले ही 1 जनवरी को नए साल का जश्न मना रही हो, लेकिन भारतीय संस्कृति के अनुसार, असली 'नूतन वर्ष' आना अभी बाकी है। इस साल 2026 में, 19 मार्च को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के साथविक्रम संवत 2083 का आगाज होगा। हमें ये समझना चाहिए कि, भारतीय काल-गणना केवल तारीखों का फेरबदल नहीं, बल्कि गौरवशाली इतिहास और खगोलीय विज्ञान का संगम है। आपको ये जानकर हैरानी और गर्व दोनों होगा कि, भारत की सबसे प्राचीन गणना हमें ईसा से भी हजारों साल पीछे उस समय में ले जाती है, जब दुनिया सभ्यता की वर्णमाला सीख रही थी। दरअसल, हमारे पास अंग्रेजी कैलेंडर से ही नहीं, बल्कि विक्रम संवत से पुराना भी एक कैलेंडर मौजूद है, जिसका नाम सप्तर्षि संवत है। इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। इस आर्टिकल में समझिए, इसका गणित।
इतिहासकार डॉ. सुरेन्द्र बिष्ट ने काल गणना पर किए शोध में कई अहम बातें बताई हैं। बिष्ट के अनुसार, भारत में काल गणना की परंपरा 'सप्तर्षि संवत' से शुरू होती है। गणना के मुताबिक, सप्तर्षि संवत की शुरुआत 6777 ईसा पूर्व में हुई थी। इसी समय भारत के पहले राजा वैवस्वत मनु का राज्याभिषेक हुआ था। यदि इसे माना जाए तो, कह सकते हैं कि, सप्तर्षि संवत की शुरुआत 8700 साल पहले हुई थी। इस हिसाब से यह भारत का सबसे पुराना कैलेंडर है। 2025 में, सप्तर्षि संवत का 5101वां साल चल रहा है। अंग्रेजी कैलेंडर दूर-दूर तक भी इसके आगे नहीं ठहरता है।
सबसे खास बात ये है कि, बात यह है कि इस तथ्य (Fact) की पुष्टि भारतीय पुराणों के साथ ही, विदेशी साक्ष्य भी करते हैं। 19वीं सदी के विद्वान कनिंघम ने अपनी किताब ‘बुक ऑफ इंडियन इराज’ में इसे मान्यता देते हुए सप्तर्षि संवत का जिक्र किया है।
यूनानी राजदूत मेगस्थनीज की फेमस बूक 'इंडिका' में भारतीय राजाओं की वंशावली का वर्णन मिलता है। उन्होंने लिखा है कि यूनानी आक्रांता सिकंदर के समय तक भारत में 154 राजा हुए थे, जिन्होंने कुल 6,451 वर्ष और 3 महीने तक राज किया। यदि सिकंदर के समय (326 ईसा पूर्व) में इन वर्षों को जोड़ दिया जाए, तो हम ठीक 6777 ईसा पूर्व के आंकड़े पर पहुंचते हैं। यह वैज्ञानिक साक्ष्य प्रमाणित करता है कि, भारत में राज्य व्यवस्था की नींव हजारों साल पहले पड़ चुकी थी।
महाभारत के वृत्तांत बताते हैं कि, जब समाज में लोभ और स्वार्थ बढ़ने लगा, तब ऋषियों ने समाज को व्यवस्थित करने के लिए वैवस्वत मनु को राजा के रूप में चुना। उनके राज्याभिषेक के साथ ही भारत में 'राजधर्म' की शुरुआत हुई और वैवस्वत मनु भारत के पहले राजा बने। तभी से सप्तर्षि संवत की शुरुआत मानी जाती है। इक्ष्वाकु और इला जैसे प्रतापी वंश उन्हीं की परंपरा से निकले, जिन्होंने आगे चलकर कृष्ण और गुरु गोविंद सिंह जैसे महापुरुषों को जन्म दिया।
सप्तर्षि कैलेंडर (Saptarishi Calendar) को आज भी मुख्य रूप से, कश्मीरी पंडित अपनाते हैं। इसे कश्मीरी समुदाय अपने पारंपरिक त्योहारों और सांस्कृतिक प्रथाओं को पता करने के लिए उपयोग करता है। जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल भी सप्तर्षि कैलेंडर का अनावरण कर चुके हैं। जानकारी के अनुसार, यह कैलेंडर सप्तर्षि तारामंडल (उरसा मेजर या बिग डिपर) की स्थिति के आधार पर 2,700 साल के एक खगोलीय चक्र पर आधारित है।
इस वर्ष 19 मार्च, गुरुवार को विक्रम संवत 2083 का स्वागत होगा। तब देशभर में गुड़ी पड़वा और उगादि जैसे उत्सवों की धूम होगी। चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर शुरू होने वाला यह नववर्ष हमें याद दिलाता है कि, हम पश्चिम के कैलेंडर से नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी और सितारों की चाल से चलते हैं।
1 जनवरी सिर्फ कैलेंडर का बदलाव है, जबकि 19 मार्च हमारी सांस्कृतिक पहचान का पुनरुद्धार है। हम केवल 57 साल नहीं बल्कि पश्चिम से हजारों साल आगे हैं। सप्तर्षि संवत से लेकर विक्रम संवत तक का सफर सिद्ध करता है कि, भारत का ज्ञान, इसकी चेतना, इसका विवेक दुनिया से हमेशा हजारों साल आगे रहा है।
Published on:
01 Jan 2026 03:39 pm
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