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रीवा में दुर्लभ पौधों को तैयार करने बनाया गया जीन बैंक, जानिए इसके बारे में

- वन अनुसंधान एवं विस्तार वृत्त ने जयंतीकुंज में जीन बैंक तैयार किया- शासन के निर्देश के बाद शुरू की गई व्यवस्था

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रीवा

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Mrigendra Singh

Apr 29, 2019

rewa

Jean Bank, designed to prepare rare plants in Rewa

रीवा। जंगलों में औषधीय महत्व के पेड़ों की प्रजातियां विलुप्त होती जा रही हैं। ऐसे में वन विभाग ने इनका विस्तार करने के लिए जीन बंैक तैयार किया है। यहां पर जिले भर के जंगलों से पेड़ों के बीज, पत्ते, कलम, डाली सहित अन्य का संकलन किया जा रहा है। इससे उसी प्रजाति का नया पौधा तैयार किया जाना है।

वन एवं अनुसंधान विस्तार वृत्त ने जीन बैंक की स्थापना जयंतीकुंज की नर्सरी में की है। यहां पर कुछ विलुप्त हो रही प्रजातियों के पौधे तैयार किए जा रहे हैं। बीते साल ही अनुसंधान विस्तार वृत्त के मुख्यालय ने निर्देश जारी कर जीन बैंक स्थापित करने के लिए निर्देश दिया था। विभाग के अधिकारियों का लगातार यहां पर भ्रमण होता रहा है और इसके लिए निर्देश भी दिए जाते रहे हैं।

इस वजह से अब एक-एक कर जहां से भी संकलन हो रहा है उसके पौधे तैयार करने की प्रक्रिया भी शुरू की जा रही है। अब तक कई प्रजातियां संकलित हो चुकी हैं। मध्यप्रदेश की सरकार ने 43 प्रजातियों को विलुप्त हो रही श्रेणी में रखा है, जिसमें रीवा में अब तक 18 के जीन से पौधे तैयार किए जाने का कार्य प्रारंभ किया गया है।

इन प्रजाति पर है जोर
विभाग ने ऐसे पेड़ों की सूची तैयार की है जो कुछ समय पहले तक जंगलों में बहुतायत में पाए जाते थे। इसमें कुछ तो ऐसे हैं जो केवल विंध्य के जंगल में ही थे, प्रदेश के दूसरे हिस्सों में नहीं हैं। इसमें प्रमुख रूप से काला शीशम, कुल्लू, गुमारिन, सोमवल्ली, मैदा, शिवनाग, वाटल, अनार, चार, अगस्त, मौलश्री, रीठा, दहिमन, गरुण, हरश्रृंगार, लालचंदन सहित अन्य कई पौधे तैयार होंगे।

ऐसे तैयार होगा जीन बैंक
अनुसंधान वृत्त द्वारा तैयार किए गए जीन बंैक के बारे में बताया गया है कि जीन बैंक एक प्रकार का जीव कोष है, जहां अनुवांशिक पदार्थ को सुरक्षित रखा जाता है। पौधों में, पौधे के कलम को हिमताप पर रखा जाता है या उसके बीज को संग्रहण करके रखा जाता है। जीन बैंक में पौधे के अनुवांशिक पदार्थ को द्रव नाइट्रोजन में ठंडे तापमान पर रखा जाता है। पौधे के तथ्य को पिघलाकर उसे फिर से उगाना संभव है। विभाग के अधिकारियों का दावा है कि कुछ प्रजातियों में सूखी डालियों या फिर पत्तों के जीन से भी उसका विकास हो सकता है। यह अनुसंधान अब रीवा में भी शुरू किया जा रहा है।

ककरेड़ी, बरदहा और मोहनिया में मिल रहे अधिक
रीवा जिले के अधिकांश जंगल भी अब महत्वपूर्ण प्रजातियों के पेड़ों से सूने होते जा रहे हैं। विभाग ने ककरेड़ी, बरदहा, क्योंटी, मोहनिया, छुहिया आदि के पहाड़ों के जंगल से बीज एवं जीन संकलित किए जा रहे हैं। कुछ ऐसी प्रजातियां हैं जो विंध्य के जंगलों से विलुप्त हो गई हैं लेकिन उड़ीसा, छत्तीसगढ़ एवं आंध्रप्रदेश में अब भी मौजूद हैं। वहां से भी संकलन किया जा रहा है।
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जंगलों से कई प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं, उनका संरक्षण करने के लिए जीन बैंक स्थापित किया गया है। अलग-अलग पद्धतियों से अनुसंधान कर मूल स्वरूप के पौधे तैयार कर रहे हैं। अब तक 18 प्रजातियों के लिए तैयारी हो चुकी है। अधिक मात्रा में पौधे तैयार होने पर आम लोगों को भी उपलब्ध कराएंगे।
-वायपी वर्मा, सहायक वन सरंक्षक अनुसंधान वृत्त