
रीवा/सतना. त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में पंच सरपंच बनने प्रत्याशी ऐसी मशक्कत करते हैं जैसे उन्हें सरकार कोई बहुत बड़ा लाभ देने वाली हो। जिला और जनपद पंचायत अध्यक्ष को छोड़ दिया जाए तो पंचायती राज के किसी भी प्रतिनिधि को शासन स्तर से ऐसी कोई सुविधा नहीं मिलती कि वह अपने परिवार का खर्च चला सके। पंचायत प्रतिनिधियों को शासन स्तर से मानदेय एवं भत्तों की व्यवस्था की जाती है, लेकिन अध्यक्ष को मिलने वाले वाहन एवं डीजल भत्ता को छोड़कर जिला, जनपद सदस्य व पंचायत प्रतिनिधियों को इतना मानदेय भी नहीं मिलता की वह अपना खर्च उठा सकें।
पंच सरपंचों को सिर्फ मासिक भत्ता चुने हुए जनप्रतिनिधियों में आर्थिक रूप से सबसे खराब स्थित पंचायत के पंच और सरपंच की है। शासन द्वारा इन्हें किसी प्रकार का मानदेय नहीं दिया जाता। सरपंच को 1700 रुपए तथा पंचों को प्रति माह मात्र 200 रुपए मासिक भत्ता मिलता है। इसके अलावा शासन द्वारा इन्हें किसी प्रकार की कोई सुविधा नहीं दी जाती। हालत यह है कि पंचायत का मुखिया होने के बाद भी आर्थिक रूप से कमजोर सरपंचों को परिवार चलाने के लिए अलग से मजदूरी करनी पड़ती है।
चुने हुए निकाय प्रतिनिधियों को वेतन भत्ते देने में नगर निगम सबसे आगे है। नगर निगम महापौर को वेतन भत्ते के रूप में हर माह 15 हजार रुपए और वाहन डीजल की व्यवस्था अलग से करता है। इसी प्रकार निगम अध्यक्ष को 12 हजार तथा पार्षदों को 6000 रुपए प्रतिमाह मानदेय दिया जाता है। जबकि जिला पंचायत अध्यक्ष को महज 11 हजार रुपए ही मानदेय के रूप में मिलते हैं।
Updated on:
15 Aug 2022 03:25 pm
Published on:
15 Aug 2022 03:06 pm
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