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रीवा के डॉक्टर का अमरीका में शोध…दिमागी झटके की बीमारी में दवाओं के बेअसर होने का खोला राज

श्यामशाह मेडिकल कॉलेज में है एसोसिएट प्रोफेसर,शोध के जरिए नई मेडिसिन की बताई आवश्यकता, नवजात बच्चों की दिमागी झटके की बीमारी पर है शोध

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रीवा

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Dilip Patel

Mar 28, 2018

रीवा। जन्म लेने के तुरंत बाद नवजात बच्चों में दिमागी झटके के केस बढ़ गए हैं। ऐसी समस्या से निपटने के लिए जो दवाएं नवजात को दी जा रही हंै वे बेअसर हैं। इसके चलते नवजात बच्चों की मृत्यु हो जाती है। इस बात की पुष्टि रीवा के पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजिस्ट ने अपने शोध में की है। शोध के जरिए कहा है कि दिमागी झटके से नवजात बच्चों को बचाने के लिए नई मेडिसिन खोजने की आवश्यकता है।


पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. दीपक द्विवेदी ने यह शोध यूनिवर्सिटी ऑफ सिंसिनॉटी चिल्ड्रेन हॉस्पिटल ओहावो स्टेट अमरीका में किया है। श्याम शाह मेडिकल कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर पदस्थ डॉ. द्विवेदी बीते वर्ष न्यूरोलॉजी में फेलोशिप के लिए अमरीका गए थे। इसी दौरान दिमागी झटके की बीमारी पर शोध किया। डॉ. द्विवेदी ने बताया कि उन्होंने 50 नवजात बच्चों पर अध्ययन किया है। इन बच्चों को जन्म लेने के बाद दिमागी झटके आए थे। यह समस्या उन नवजातों में थी जो जन्म लेने के बाद या तो रोये नहीं थे या फिर बहुत अधिक रोये थे। इनको झटके की दवा फिनो बार्बिटॉल दी गई थी लेकिन दवा का कोई असर नहीं हो रहा था। जिसके बाद सभी नवजातों की एमआरआई कराई गई। रिपोर्ट में पाया गया कि जिन नवजात बच्चों पर दवा का असर नहीं हो रहा था उनके मस्तिष्क में वाटरशेड फॉर कार्टिकल रीजन में चोटें थी। उन्होंने बताया कि पूरी दुनिया में दिमागी झटके से बचाने के लिए डॉक्टर फिनो बर्बिटॉल दवा का उपयोग ही करते हैं। लेकिन अब इस दवा के अलावा नई मेडिसिन तैयार करने की आवश्यकता है। इसके अलावाा अध्ययन में सीजर स्कोर कलकुलेट पद्वति को भी अपनाया गया है जिसमें कई पैरामीटर्स चेक किए गए। जिन नवजात बच्चों में सीजर स्कोर अधिक था उन पर भी दवा बेअसर साबित हुई। दिमागी झटके की इस अवस्था को बर्थ एक्सपेसिया कहा जाता है।


15 फीसदी नवजातों की हो जाती है मौत
डॉ. द्विवेदी के अनुसार देश में सबसे ज्यादा नवजात बच्चों की मौत इसी कारण से होती है। रीवा संभाग में यह स्थिति 20 प्रतिशत तक है। प्रसव के दौरान दीमाग में आक्सीजन की कमी से यह अवस्था बनती है। जैसे-जैसे चोट बढ़ती है वैसे-वैसे नवजात के दिमागी झटके तीव्र हो जाते हैं।


इन लक्षणों से होती है बीमारी की पहचान
प्रसव के बाद नवजात का रोना बेहद जरूरी होता है। अगर नवजात रोता नहीं है तो उसे तत्काल एसएनसीयू में भर्ती करना चाहिए क्योंकि दिमागी झटके की बीमारी का यह मुख्य लक्षण है। इसके अलावा नवजात जरूरत से अधिक रो रहा है शांत ही न हो तो भी दिमागी झटके की बीमाारी संभव है। दिमागी झटके दिखाई नहीं देते हैं केवल इन्हीं लक्षणों से पहचान की जाती है।