
datia news (भाई ने की भाई की हत्या Photo Source- Patrika)
छतरपुर. आधुनिकता के इस दौर में भी छतरपुर जिले में नवजात बच्चों के सही पोषण और देखरेख को लेकर पुरानी भ्रांतियां और सामाजिक कुप्रथाएं खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की ताजा रिपोर्ट ने जिले में शिशु स्वास्थ्य को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर पेश की है। आंकड़ों के मुताबिक, छतरपुर जिले में लगभग 43.6 प्रतिशत बच्चों को जन्म के छह महीने पूरे होने से पहले ही मां के दूध के साथ-साथ पानी, शहद, घुट्टी या ऊपरी आहार देना शुरू कर दिया जाता है। जिले में केवल 56.4 प्रतिशत नवजात शिशुओं को ही जन्म के शुरुआती छह महीनों तक केवल मां का दूध (एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग) मिल पाता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हर साल विश्व स्तनपान सप्ताह और कई तरह के जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर पारिवारिक सोच में बड़ा बदलाव नहीं आ पाया है। जन्म के तुरंत बाद नवजात को शहद चटाना, घुट्टी पिलाना या ऊपर से पानी देना जैसी पुरानी परंपराएं बच्चों के जीवन और सेहत पर भारी पड़ रही हैं।
शहद और घुट्टी की परंपरा सबसे बड़ी बाधा
डॉ. लखन तिवारी के अनुसार परिवारों में यह गलतफहमी आज भी बनी हुई है कि जन्म के शुरुआती दिनों में मां का दूध बच्चे के लिए पर्याप्त नहीं होता या बच्चा प्यासा रह जाता है। इसी धारणा के कारण नवजात को प्री-लेक्टियल फीड यानी मां के दूध से पहले अन्य चीजें देनी शुरू कर दी जाती हैं। जब बच्चे को बाहर से शहद, पानी या घुट्टी दी जाती है, तो वह मां का दूध कम पीता है। इससे बच्चे को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता और उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) कमजोर हो जाती है। नतीजतन, नवजात को दस्त, निमोनिया, कुपोषण और तरह-तरह के संक्रमण आसानी से घेर लेते हैं।
14 फीसदी बच्चे जन्म से ही कम वजन के शिकार
स्वास्थ्य मानकों के अनुसार जन्म के समय नवजात शिशु का वजन कम से कम 2.5 किलोग्राम (ढाई किलो) होना चाहिए। लेकिन जिले में 14 प्रतिशत बच्चे जन्म से ही कम वजन (लो बर्थ वेट) के पैदा हो रहे हैं।
कम वजन वाले और कमजोर बच्चों के लिए मां का पहला गाढ़ा पीला दूध (कोलोस्ट्रम) किसी जीवनरक्षक दवा से कम नहीं होता। यदि इन बच्चों को शुरुआती 6 महीने तक केवल मां का दूध दिया जाए, तो इनके स्वास्थ्य में तेजी से सुधार लाया जा सकता है। इसके विपरीत, समय से पहले ऊपरी आहार देने से इन कमजोर बच्चों के जान का जोखिम और बढ़ जाता है।
जानिए क्यों खतरनाक है 6 माह से पहले ऊपरी आहार
संक्रमण का खतरा: अशुद्ध पानी, शहद या बर्तन के जरिए नवजात के पेट में सीधे बैक्टीरिया प्रवेश कर जाते हैं, जिससे बच्चा बार-बार बीमार पड़ता है।
पाचन तंत्र पर दबाव: नवजात शिशु का पाचन तंत्र इतना विकसित नहीं होता कि वह मां के दूध के अलावा किसी भी अन्य ठोस या तरल आहार को पचा सके।
पानी की भी जरूरत नहीं: डॉक्टरों के मुताबिक 6 महीने तक मां के दूध में 80 प्रतिशत से अधिक पानी होता है। भीषण गर्मी में भी बच्चे को ऊपर से पानी देने की आवश्यकता नहीं होती।
घर-घर जाकर काउंसलिंग करेगा स्वास्थ्य विभाग
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अधिकारियों का कहना है कि जन्म से 6 माह तक बच्चे के लिए केवल मां का दूध ही संपूर्ण आहार है। परंपराओं, भ्रांतियों और जागरूकता की कमी के कारण नवजात को समय से पहले अन्य चीजें दी जा रही हैं, जिसे रोकना बेहद जरूरी है।
इस स्थिति को बदलने के लिए अब स्वास्थ्य विभाग द्वारा आशा, एएनएम और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से घर-घर जाकर माताओं और उनके परिजनों की विशेष काउंसलिंग की जाएगी। गर्भवती महिलाओं को प्रसव पूर्व जांच के दौरान ही स्तनपान के महत्व और ऊपरी आहार के खतरों के बारे में जागरूक किया जाएगा, ताकि जिले में कुपोषण की दर पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।
Updated on:
27 Aug 2026 06:00 am
Published on:
27 Aug 2026 06:00 am
